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<title>.:: کرد شیرازی ::</title>
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<description>..:: زندگی و فرهنگ کردان فارس و ایران ::.. </description>
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<lastBuildDate>Mon, 23 Nov 2009 04:41:56 GMT</lastBuildDate>
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<title>تعدادی از واژه های رایج در بین کردان کرونی چهل چشمه</title>
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<description> &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;واژه فارسی	تلفظ محلی  کردان کرونی چهل چشمه	               تلفظ محلی با آوا&lt;br /&gt;پدر	بوا	bova&lt;br /&gt;مادر	ننه- دالک	Nane- dalek&lt;br /&gt;برادر	کاکا- برا	bera-Kăkă&lt;br /&gt;خواهر	دده - خویشک	dade&lt;br /&gt;پسر	کور	farzand&lt;br /&gt;دختر	دیت	Diyat&lt;br /&gt;زن (همسر)	ژن	dă&lt;br /&gt;شوهر	شی	uš&lt;br /&gt;عمه	امه	ammah&lt;br /&gt;خاله	خاله	mimi&lt;br /&gt;دائی	هالو	hăloo&lt;br /&gt;عمو	عامو- تاته	mooă&lt;br /&gt;دست	دس	das&lt;br /&gt;پا	پا	po&lt;br /&gt;سر	سر-کله	 &lt;br /&gt;چشم	چو	čhu&lt;br /&gt;دهان	دم	dam&lt;br /&gt;بینی	لیت-دماغ	let&lt;br /&gt;گردن	گردٍن	garden&lt;br /&gt;شکم	زک	zek&lt;br /&gt;مو	می	mi &lt;br /&gt;ابرو	 	 &lt;br /&gt;مژه	 	 &lt;br /&gt;گوش	 	 &lt;br /&gt;لب	 	 &lt;br /&gt;انگشت	کلک	kelek&lt;br /&gt;دندان	دنان	denăn&lt;br /&gt;زبان	زوان	zowăn&lt;br /&gt;گاو	گا	gă&lt;br /&gt;گوسفند	میه	meah&lt;br /&gt;بز	بزن	bezen&lt;br /&gt;گاو داری	گاداری	gădări&lt;br /&gt;سگ	 	 &lt;br /&gt;گربه	گلو	gulo&lt;br /&gt;موش	مشک	moshk&lt;br /&gt;گنجشک	ملیچگ	malicheg&lt;br /&gt;کبوتر	کموتر	kamotar&lt;br /&gt;مرغ	مامر	mamer&lt;br /&gt;خروس	 تل شیر	talešir&lt;br /&gt;اسب	 	 &lt;br /&gt;قاطر	 	 &lt;br /&gt;الاغ	خر	khar&lt;br /&gt;شتر	 	 &lt;br /&gt;پلنگ	پِلی	pelay&lt;br /&gt;قورباغه	 	 &lt;br /&gt;ماهی	مایی	maei&lt;br /&gt;کلاغ	غلا	ghala&lt;br /&gt;جغد	 	 &lt;br /&gt;پروانه	کپو	kapuo&lt;br /&gt;زنبور	گنج	gonj&lt;br /&gt;پشه	پشقه	pashghah&lt;br /&gt;مگس	 	 &lt;br /&gt;گرگ	 	 &lt;br /&gt;روباه	روا	roaa&lt;br /&gt;کفتار	 	 &lt;br /&gt;خرس	 	 &lt;br /&gt;شغال	توره	ture&lt;br /&gt;سوسمار	 	 &lt;br /&gt;مار	 	 &lt;br /&gt;عقرب	عقرو	aqero&lt;br /&gt;رطیل	 	 &lt;br /&gt;گراز	 	 &lt;br /&gt;ببر	 	 &lt;br /&gt;ساس	 	 &lt;br /&gt;کنه	 	 &lt;br /&gt;شپش	گیاندار	geandar&lt;br /&gt;بچه	ملال	melal&lt;br /&gt;بزرگ	قه ای  - گورا	qora- ghaee&lt;br /&gt;کوچک	بیچگ	beček&lt;br /&gt;خوشگل	 	 &lt;br /&gt;زشت	گن	gan&lt;br /&gt;بد	 	 &lt;br /&gt;خوب	 	 &lt;br /&gt;شب	شو	šow&lt;br /&gt;روز	 	 &lt;br /&gt;دیروز	دیکه	deakah&lt;br /&gt;پریروز	پیرکه	perakah&lt;br /&gt;امروز	امرو	emroo&lt;br /&gt;فردا	سب	sob  &lt;br /&gt;پس فردا	دوسب	dosob&lt;br /&gt;صبح	شوسب	sho sob&lt;br /&gt;ظهر	نیم رو	Nimroo&lt;br /&gt;عصر	ایواره	Eyvăre&lt;br /&gt;غروب	ایواره	Eyvăre&lt;br /&gt;خورشید	خور	khovar&lt;br /&gt;ماه	مانگ	mang&lt;br /&gt;ستاره	 	 &lt;br /&gt;زمین	زه ای	zaee&lt;br /&gt;آسمان	 	 &lt;br /&gt;آب	او	ow&lt;br /&gt;باد	وا	wă&lt;br /&gt;باران	واران	wărăn&lt;br /&gt;ابر	اور	owr&lt;br /&gt;تگرگ	تغر- تگر	teger&lt;br /&gt;رعد	تش و برق	tašhobarq&lt;br /&gt;طوفان	 	 &lt;br /&gt;سیل	 	 &lt;br /&gt;زمین لرزه	زه ای لرزه	zaee larzah&lt;br /&gt;بید	 	 &lt;br /&gt;سرو	 	 &lt;br /&gt;کاج	 	 &lt;br /&gt;سپیدار	 	 &lt;br /&gt;تبریزی	 	 &lt;br /&gt;سنجد	سرنجل	serenjel&lt;br /&gt;گردو	 	 &lt;br /&gt;گوجه	گرجه - تماته	gorjah- tamatah&lt;br /&gt;زرد آلو	 	 &lt;br /&gt;بادام	 	 &lt;br /&gt;عدس	 	 &lt;br /&gt;لوبیا	 	 &lt;br /&gt;ماش	ماشک	mashak&lt;br /&gt;جو	جیه 	jeeah&lt;br /&gt;گندم	گنم	ganem&lt;br /&gt;برنج	 	 &lt;br /&gt;چای	چوی	choee&lt;br /&gt;پنبه	پمگ	pameg&lt;br /&gt;هویج	گزر	gazar&lt;br /&gt;پیاز	 	 &lt;br /&gt;چغندر	چونر	chonar&lt;br /&gt;هندوانه	شامی	šămi&lt;br /&gt;انار	نار	nar&lt;br /&gt;انگور	 	 &lt;br /&gt;نخل	 	 &lt;br /&gt;خرما	 	 &lt;br /&gt;گل محمدی	گل بو	gole boo&lt;br /&gt;گل نرگس	 	 &lt;br /&gt;خانه	مال	măl&lt;br /&gt;در	درکه	darakah&lt;br /&gt;پنجره	دریچه	darichah&lt;br /&gt;طاقچه	 	 &lt;br /&gt;رف	رُفه	rofa&lt;br /&gt;سقف	بان بون	bane bun&lt;br /&gt;زیرزمین	ژیر زه ای	Zher zaee&lt;br /&gt;حیاط	 	 &lt;br /&gt;پشت بام	خانیک – بان بون	Xănig – banebun&lt;br /&gt;جرز	کنا	kona&lt;br /&gt;خشت	 	 &lt;br /&gt;آجر	 	 &lt;br /&gt;انبار	 	 &lt;br /&gt;اصطبل	 	 &lt;br /&gt;آسیاب	آسیو	ašiyow&lt;br /&gt;تنور	کو وانگ	ko vaneg&lt;br /&gt;آشپزخانه	مُدبخ	modbax&lt;br /&gt;مستراح	خلا	xală&lt;br /&gt;دالان	دالون	dăloon&lt;br /&gt;کوچه	کوچه	kuča&lt;br /&gt;مسجد	مچد	mačed&lt;br /&gt;کوه	کیه	keyah&lt;br /&gt;تپه	تل	tol&lt;br /&gt;دشت	 	 &lt;br /&gt;رودخانه	رخانه	rexana&lt;br /&gt;چمنزار	چم 	cham&lt;br /&gt;جوی	جو	jo&lt;br /&gt;دره	درگ	dereg&lt;br /&gt;سفیدی	چرمگی	čarmi&lt;br /&gt;سیاهی	سیه ای	sea ei&lt;br /&gt;قرمز	 	 &lt;br /&gt;سبز	سوز	sowz&lt;br /&gt;زرد	 	 &lt;br /&gt;آبی	 	 &lt;br /&gt;خاکی	 	 &lt;br /&gt;خوبی	 	 &lt;br /&gt;بدی	 	 &lt;br /&gt;بزرگی	قه اینی	qa eini&lt;br /&gt;کوچکی	بیچگی	bečegi&lt;br /&gt;زردی	 	 &lt;br /&gt;پاکی	 	 &lt;br /&gt;نجسی	گنی	gani&lt;br /&gt;مهربانی	 	 &lt;br /&gt;کثیفی	 	 &lt;br /&gt;تمیزی	تمژی	tamiзi&lt;br /&gt;دشمنی	 	 &lt;br /&gt;فرش	 	 &lt;br /&gt;هیزم	چیلنگ	chileng&lt;br /&gt;نمک	خوآ	xuă&lt;br /&gt;سنگ پا	پاشور	păšur&lt;br /&gt;چرم	 	 &lt;br /&gt;آهن	 	 &lt;br /&gt;دوک	کرمان	kerman&lt;br /&gt;مخمل	 	 &lt;br /&gt;قالی	 	 &lt;br /&gt;پیراهن	کراس	karăs&lt;br /&gt;شلوار	 	 &lt;br /&gt;گوشواره	گوشوار	gušwăr&lt;br /&gt;کلاه	کلو	kolow&lt;br /&gt;جوراب	جیرو	jerow&lt;br /&gt;کفش	گیوه – کوش	Give  - kowš&lt;br /&gt;کت	کوت	koot&lt;br /&gt;قبا	قوا	qava&lt;br /&gt;سرمه	سورمه	surme&lt;br /&gt;انگشتر	 	 &lt;br /&gt;عروس	 	 &lt;br /&gt;داماد	دوما	dumă&lt;br /&gt;ویار	آرمه	ărme&lt;br /&gt;آبستن	لمی پره - زک پر	Lame pere- zek per&lt;br /&gt;زائو	 	 &lt;br /&gt;زایمان	زایین - ملال اوه ردن	melal averden - zaeein&lt;br /&gt;نوزاد	اول	ow el&lt;br /&gt;اول	 	 &lt;br /&gt;دوم	 	 &lt;br /&gt;سوم	 	 &lt;br /&gt;چهارم	چوارم	chovarom&lt;br /&gt;پنجم	 	 &lt;br /&gt;نهم	نم	nom&lt;br /&gt;یک	 	 &lt;br /&gt;دو	 	 &lt;br /&gt;سه	 	 &lt;br /&gt;چهار	چوار 	chovar &lt;br /&gt;پنج	 	 &lt;br /&gt;شش	شیش	shish&lt;br /&gt;هفت	 	 &lt;br /&gt;هشت	 	 &lt;br /&gt;نه	 	 &lt;br /&gt;ده	 	 &lt;br /&gt;یازده	 	 &lt;br /&gt;دوازده	 	 &lt;br /&gt;سیزده	 	 &lt;br /&gt;چهارده	چوارده	chorardah&lt;br /&gt;بیست	 	 &lt;br /&gt;سی	 	 &lt;br /&gt;چهل	چل	chel&lt;br /&gt;پنجاه	 	 &lt;br /&gt;شصت	شس	shas&lt;br /&gt;هفتاد	 	 &lt;br /&gt;هشتاد	 	 &lt;br /&gt;نود	 	 &lt;br /&gt;صد	 	 &lt;br /&gt;دویست	دوس	dos&lt;br /&gt;سیصد	 	 &lt;br /&gt;چهارصد	چوارصد	chovarsad&lt;br /&gt;پانصد	 	 &lt;br /&gt;ششصد	شیشصد	shishsad&lt;br /&gt;هفتصد	 	 &lt;br /&gt;هشتصد	 	 &lt;br /&gt;نهصد	 	 &lt;br /&gt;هزار	 	 &lt;br /&gt;دوهزار	 	 &lt;br /&gt;ده هزار	 	 &lt;br /&gt;صدهزار	 	 &lt;br /&gt;خوابیدن	خفتن	khaften&lt;br /&gt;رفتن	چی این	če in&lt;br /&gt;آمدن	هاتن	hăten&lt;br /&gt;مردن	مِردن	merdan&lt;br /&gt;خوردن	خواردن	khovarden&lt;br /&gt;شنیدن	شنفتن	šenaftan&lt;br /&gt;گفتن	وتن	veten&lt;br /&gt;نشستن	نیشتن	ništen&lt;br /&gt;برخاستن	بلند او بین	vezăne&lt;br /&gt;بلندکردن	بولند کردن	bolend kerden&lt;br /&gt;می خوابم	اخفم	akhafem&lt;br /&gt;می خوابی	اخفی	akhafi&lt;br /&gt;می خوابد	اخفه	akhafeh&lt;br /&gt;می خوابیم	اخفیم	akhafim&lt;br /&gt;می خوابید	اخفن	akhafen&lt;br /&gt;می خوابند	خفتن	khaften&lt;br /&gt;برو	بچو	bočo&lt;br /&gt;بیا	بو	bow&lt;br /&gt;بخور	بخوه	bokhovah&lt;br /&gt;بزن	بوکوش	bokoš&lt;br /&gt;بگو	بیژ	biš&lt;br /&gt;بنشین	بنیش	biniš&lt;br /&gt;بردار	الگر	begreo&lt;br /&gt;ببر	بوور	buvar&lt;br /&gt;برخیز	الساه	alesah&lt;br /&gt;بشنو	بشنف	bešnof&lt;br /&gt;گفتم	وتم	vatem&lt;br /&gt;گفتی	وتی	vati&lt;br /&gt;گفت	وت	vet&lt;br /&gt;گفتیم	وتیم	vatim&lt;br /&gt;گفتید	وتیتان	vatitan&lt;br /&gt;گفتند	وتن	vaten&lt;br /&gt;دارم میروم	درم اچم	derm ačam&lt;br /&gt;داری میروی	دری اچی 	deri ači&lt;br /&gt;دارد می رود	دره اچت	dereh ačet&lt;br /&gt;داریم می رویم	دریم اچیم	derim ačem&lt;br /&gt;دارید می روید	دریتان اچیتان	deritan ačetan&lt;br /&gt;دارند می روند	درن اچن	dern ačen&lt;br /&gt;فردا به سفر خواهیم رفت	صب اچم ارای مسافرت	sob bečim aray mosăferat.&lt;br /&gt;دیروز وقتی به خانه می رفتم برادرم را دیدم	دیکه وقتی اچیام ارای مال ، براکمی  دیم	deyaka vaqti ačiyăm  aray măle, berăkămi dim.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;

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<pubDate>Mon, 23 Nov 2009 04:41:56 GMT</pubDate>
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<title>لک ها</title>
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<description>&lt;DIV class=posttitle&gt;
&lt;P&gt;&lt;/P&gt;&lt;STRONG&gt;&lt;FONT color=#ff0099&gt;لک های ایران&lt;/FONT&gt;&lt;/STRONG&gt;&lt;/DIV&gt;
&lt;DIV class=postbody&gt;
&lt;P&gt;&lt;FONT color=#3333ff&gt;گفته می شود در دوران موسوم به افشاریه شخصی که نادر شاه افشار نامیده می شود صد هزار نفر از &lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P&gt;&lt;FONT color=#3333ff&gt;مردم لک را از هندوستان به مناطق فعلی آورد.لک در زبان سانسکریت به معنی ۱۰۰۰۰۰(صد هزار)&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P&gt;&lt;FONT color=#3333ff&gt;،نشان و... می باشد.همچنین کلمه لک در نامهای قدیمی سریلانکا نیز وجود دارد: لک دیوا(&lt;FONT color=#3333ff&gt;Lakdiva&lt;/FONT&gt;)،لک&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P&gt;&lt;FONT color=#3333ff&gt; بیما(&lt;FONT color=#3333ff&gt;Lakbima&lt;/FONT&gt;)!نام قدیمی اسلام آباد غرب که لک ها نیز در آن سکونت دارند مندلی بوده است و مندلی&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P&gt;&lt;FONT color=#3333ff&gt; بنا به نوشته لغت نامه دهخدا یعنی منسوب به مندل،شهری در هندوستان! همچنین مندلی نام &lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P&gt;&lt;FONT color=#3333ff&gt;شهری است در عراق که لک ها در آن ساکن هستند.نام قدیمی شهر ایلام که لک ها نیز در آن سکونت &lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P&gt;&lt;FONT color=#3333ff&gt;دارند دیوالا بوده است و یکی از معانی دیوا در زبان سانسکریت جزیره می باشد( از معانی دیگر آن &lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P&gt;&lt;FONT color=#3333ff&gt;نور،روز و... می باشد)که در نام قدیمی &lt;/FONT&gt;&lt;FONT color=#3333ff&gt;سریلانکا نیز دیده می شود. نامهای سانسکریت این مناطق نیز &lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P&gt;&lt;FONT color=#3333ff&gt;موید آن است که عده ای از لک ها از &lt;/FONT&gt;&lt;FONT color=#3333ff&gt;هندوستان و سریلانکا به مناطق فعلی آورده شده اند.&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P&gt;&lt;FONT color=#3333ff&gt;کلمه لک همچنین در نام الهه ثروت هندوها لاکشمی یا لکشمی(&lt;FONT color=#3333ff&gt;Lakshmi&lt;/FONT&gt;)نیز دیده می شود.&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P&gt;&lt;STRONG&gt;&lt;FONT color=#ff0099&gt;لک هایی که زبان آنها ترکی و احتمالا ریشه قفقازی دارند :&lt;/FONT&gt;&lt;/STRONG&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P&gt;&lt;FONT color=#3333ff&gt; لک یکی از طوائف ایل قشقائی است ، مرکب از &lt;SPAN class=highlight dir=ltr&gt;80&lt;/SPAN&gt; خانوار که در همراه عمله ساکن هستند.(لغت نامه&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P&gt;&lt;FONT color=#3333ff&gt; دهخدا)&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P&gt;&lt;FONT color=#3333ff&gt;روستای لکستان سلماس&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P&gt;&lt;FONT color=#3333ff&gt;روستای لک نازلو ارومیه&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P&gt;&lt;FONT color=#3333ff&gt;لک های تبریز&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P&gt;&lt;STRONG&gt;&lt;FONT color=#3333ff&gt;&lt;FONT color=#ff0099&gt;لک هایی که در اصل کولی هستند&lt;/FONT&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;FONT color=#ff0099&gt;:&lt;/FONT&gt;&lt;/STRONG&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P&gt;&lt;FONT color=#3333ff&gt;ایلات کولیوند-رومانوند&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P&gt;&lt;FONT color=#ff0099&gt;&lt;STRONG&gt;لک هایی که ریشه عربی و حجازی دارند:&lt;/STRONG&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P&gt;&lt;STRONG&gt;&lt;FONT color=#3333ff&gt;ایل بیرانوند:&lt;/FONT&gt;&lt;/STRONG&gt;&lt;FONT color=#ff0099&gt;&lt;FONT color=#3333ff&gt;بنا به نوشته دایره المعارف اسلامیکا&lt;/FONT&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;FONT color=#3333ff&gt;ایل بیرانوند در سنتهای شفاهی ریشه خود را به اعراب نسبت &lt;/FONT&gt;&lt;FONT color=#3333ff&gt;میدهند:&lt;/FONT&gt;&lt;FONT color=#3333ff&gt;بر اساس روایت محلی ، بیرانونها از نسل کسی به نام هجیالی یا هجالی اند که از حجاز به لرستان مهاجرت کرده است . او از حجاز به منطقة دلفان آمد و نزد بابابزرگ ، که اکنون مقبره اش زیارتگاه اهل حق است ، ماندگار شد و با دختر یکی از بزرگان دلفان به نام توشمال  [= کدخدا/ رئیس]  علوی ازدواج کرد و صاحب دو فرزند به نامهای بیران(بیرام یا بهرام)و باجول شد که اولی نیای پانزدهم ایل بیرانون و دومی بانی ایل باجولْوَند * یا باجُلان است ، اما به نوشتة والیزاده معجزی (ص 311) چند قرن پیش ، شخصی از عربستان به نام هجیالی ، که می گویند محرف کلمة «حجازی » است ، در معیت یکی از دُعاة علوی ، که احتمالاً از داعیان اهل حق و صاحب بقعة مشهور به «بابای بزرگ » بوده و قبرش در منطقة کاکاوند دلفان واقع شده ، به دلفان آمده است . براساس نوشته های اهل حق ، بابابزرگ در قرن پنجم می زیسته (صفی زاده ، ص 85 ـ86) و حال آنکه هجیالی ، که نیای شانزدهم بیرانونهاست ، در نیمة اول قرن دهم یعنی در زمان سلطنت شاه اسماعیل و شاه طهماسب اول (931ـ984) زندگی می کرده است . بر اساس گزارش راولینسون در 1252، بیرانونها و باجُلانها در قرن دوازدهم ، یعنی در اواخر دورة صفویه یا در زمان افشاریه ، از نواحی موصل آمدند و به لرستان پناهنده شدند (ص 152). &lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P&gt;&lt;FONT color=#3333ff&gt;ایل بیرانون نخست به دو شاخة آلاهینان (آلاینان ) و دشائینان (دشی نو) از نسل دو فرزند بیران تقسیم می شود.منطقة گرمسیری بیرانونها در پشتکوه لرستان قرار دارد که فعلاً استان ایلام نامیده می شود. گروهی از بیرانونها (تیرة زیدعلی ) در ماژین در دامنة کبیرکوه ، و عده ای در حُسینه (منطقة گرمسیری بهاروند) یکجانشین شده اند. ییلاق بیرانونها منطقة پهناوری بین خرم آباد و بروجرد است . این منطقه شامل بخش چقلوندی ، قسمتی از سیلاخور، قسمتهایی از بخش زاغه و بالاخره ریمله ، اسکین و جز آن است . افزون بر این ، بیشتر بیرانونها هم اکنون در خرم آباد زندگی می کنند.عده ای از ایل بیرانوند نیز در زمان رضا خان به خراسان شمالی تبعید شده اند.&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P&gt;&lt;FONT color=#3333ff&gt;&lt;STRONG&gt;ایل باجولوند یا باجلان:&lt;/STRONG&gt; قسمتی از ایل باجلان(قسمتی دیگر  گوران و قسمی دیگر شبک محسوب میشوند) لک هستند و همانند بیرانوندها نسب خود را به اعراب میرسانند.&lt;/FONT&gt;&lt;FONT color=#3333ff&gt;پنج طایفة لک یاراحمد، آروان ، دالوند، قایدرحمت و سگوند که عمدتاً در بخش زاغة شهرستان خرم آباد و بخشی نیز در قسمتی از سیلاخورِ عُلیا در نزدیکی شهر بروجرد و ناحیة میانْآبِ دزفول و اطراف شوش ساکن شده اند و گروهی نیز چادرنشین مانده اند قسمتی از ایل باجلان را که لک هستند تشکیل میدهند.&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P&gt;&lt;FONT color=#3333ff&gt;زبان ایل بیرانوند و قسمتی از ایل باجولوند یا باجلان هم اکنون مانند اکثر لک های از هند آمده  شبیه زبان سانسکریت میباشد.&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P&gt;&lt;FONT color=#3333ff&gt;&lt;STRONG&gt;ایل دلفان:&lt;/STRONG&gt;در حقیقت همان دلفی های عرب هستند.&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P&gt;&lt;STRONG&gt;&lt;FONT color=#ff0099&gt;لک هایی که به زبان بختیاری صحبت میکنند:&lt;/FONT&gt;&lt;/STRONG&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P&gt;&lt;FONT color=#3333ff&gt;طایفه نوروزی طایفه دینارانی ایل بختیاری در حقیقت لک هستند.&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P&gt;&lt;FONT color=#3333ff&gt;تیره های طایفه نوروزی:&lt;FONT color=#3333ff&gt;بامیروند - کمالوند - یارعلی وند- ابراهیم وند - خورشید وند - غلام وند&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;&lt;/FONT&gt;
&lt;P&gt;&lt;STRONG&gt;&lt;FONT color=#ff0099&gt;لک هایی که زبانشان شبیه زبان سانسکریت می باشد:&lt;/FONT&gt;&lt;/STRONG&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P&gt;&lt;FONT color=#3333ff&gt;&lt;STRONG&gt;استان لرستان:&lt;/STRONG&gt;ایلات یوسفوند،حسنوند&lt;STRONG&gt;،&lt;/STRONG&gt;کولیوند&lt;STRONG&gt; &lt;/STRONG&gt;الشتر-کوهدشت-خرم آباد-سلسله-دلفان-بروجرد-&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P&gt;&lt;FONT color=#3333ff&gt;ایل&lt;/FONT&gt;&lt;FONT color=#3333ff&gt;گراوند روستای بیشه درود و...&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P&gt;&lt;FONT color=#3333ff&gt;&lt;STRONG&gt;استان کرمانشاه:&lt;/STRONG&gt;ایل کاکاوند&lt;STRONG&gt; &lt;/STRONG&gt;هرسین- ایل گراوند اسلام آباد غرب-ایل جلالوند کرند غرب-صحنه- ایل &lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P&gt;&lt;FONT color=#3333ff&gt;پایروند در کوه &lt;/FONT&gt;&lt;FONT color=#3333ff&gt;پرآو و درود فرامان کرمانشاه-ایل کلیایی سنقر و...&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P&gt;&lt;FONT color=#3333ff&gt;&lt;STRONG&gt;استان همدان:&lt;/STRONG&gt;ایل چهاردولی و روستاهای خنداب و قاسم آباد&lt;STRONG&gt; &lt;/STRONG&gt;اسد آباد-نهاوند-تویسرکان-ایلات &lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P&gt;&lt;FONT color=#3333ff&gt;غیاثوند&lt;STRONG&gt;،&lt;/STRONG&gt;جلیل وند،کاکاوند ملایر و...&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P&gt;&lt;FONT color=#3333ff&gt;&lt;STRONG&gt;استان ایلام:&lt;/STRONG&gt;شیروان و چرداول و...&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P&gt;&lt;FONT color=#3333ff&gt;&lt;STRONG&gt;استان کرمان:&lt;/STRONG&gt; ایل منوخان جیرفت-ایلات لک و سهرابی یا سهرایوند سیرجان-طایفه لک پاریز و...&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P&gt;&lt;FONT color=#3333ff&gt;&lt;STRONG&gt;استان فارس:&lt;/STRONG&gt; طایفه ای به نام کورونی از لک های طرهان در روستاهای خدا آباد و شاهپور کازرون و &lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P&gt;&lt;FONT color=#3333ff&gt;روستای چهل چشمه شیراز -ایل چهاردولی شیراز-...&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P&gt;&lt;FONT color=#3333ff&gt;&lt;STRONG&gt;استان خوزستان:&lt;/STRONG&gt;ایل &lt;/FONT&gt;&lt;FONT color=#3333ff&gt;گراوند باغ &lt;/FONT&gt;&lt;FONT color=#3333ff&gt;ملک و ...&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P&gt;&lt;FONT color=#3333ff&gt;&lt;STRONG&gt;استان قزوین:&lt;/STRONG&gt;روستای شاه آباد قزوین -ایلات غیاثوند&lt;STRONG&gt;،&lt;/STRONG&gt;جلیل وند،کاکاوند قزوین و...&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P&gt;&lt;FONT color=#3333ff&gt;&lt;STRONG&gt;استان آذربایجان غربی:&lt;/STRONG&gt;ایل چهاردولی شاهین دژ&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P&gt;&lt;FONT color=#3333ff&gt;&lt;STRONG&gt;استان مازندران:&lt;/STRONG&gt; تیره هایی از طوایف لک دلفان در روستاهای تیت دره و مکارود و کجور- ایل خواجه وند &lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P&gt;&lt;FONT color=#3333ff&gt;در اکثر روستاهای کلاردشت و کجور-ایل چهاردولی نور-روستای میانکاله و روستای زاغ مرز بهشهر-&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P&gt;&lt;FONT color=#3333ff&gt;&lt;STRONG&gt;استان تهران:&lt;/STRONG&gt;ایل بیرانوند و ایل هداوند&lt;STRONG&gt; &lt;/STRONG&gt;ورامین-ایل چهاردولی کرج&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P&gt;&lt;FONT color=#3333ff&gt;&lt;STRONG&gt;استان مرکزی:&lt;/STRONG&gt; روستای نینه محلات&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P&gt;&lt;FONT color=#3333ff&gt;&lt;STRONG&gt;استان کردستان:&lt;/STRONG&gt; ایل چهاردولی قروه-&lt;FONT color=#3333ff&gt;روستای لک قروه-&lt;/FONT&gt;&lt;FONT color=#3333ff&gt;روستای لک خدابنده لو قروه-گروس های بیجار&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;&lt;/FONT&gt;
&lt;P&gt;&lt;FONT color=#3333ff&gt;&lt;STRONG&gt;استان کهگیلویه و بویر احمد:&lt;/STRONG&gt;ایل چهاردولی کهگیلویه&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P&gt;&lt;FONT color=#3333ff&gt;&lt;STRONG&gt;استان گلستان:&lt;/STRONG&gt;ایل بیرانوند گرگان&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P&gt;&lt;FONT color=#3333ff&gt;&lt;STRONG&gt;استان اصفهان:&lt;/STRONG&gt;طایفه نایبی&lt;STRONG&gt; &lt;/STRONG&gt;ایل بیرانوند کاشان&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P&gt;&lt;FONT color=#3333ff&gt;&lt;STRONG&gt;استان قم:&lt;/STRONG&gt;ایل بیرانوند قم&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P&gt;&lt;FONT color=#3333ff&gt;&lt;/FONT&gt; &lt;/P&gt;
&lt;P&gt;&lt;STRONG&gt;&lt;FONT color=#ff0099&gt;ایلات و طوایف لک در ایران:&lt;/FONT&gt;&lt;/STRONG&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P&gt;&lt;FONT color=#3333ff&gt; زند-&lt;/FONT&gt;&lt;FONT color=#3333ff&gt; کاکاوند-دالوند-کولیوند-رومانوند-بیرانوند-گروس-کلیایی-&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P&gt;&lt;STRONG&gt;&lt;FONT color=#ff0099&gt;منابع(Sources):&lt;/FONT&gt;&lt;/STRONG&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P&gt;&lt;FONT color=#3333ff&gt;لغت نامه دهخدا&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P&gt;&lt;FONT color=#3333ff&gt; بومیان دره مهرگان  نوشته رستم خان رحیمی عثمانوندی&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P&gt;&lt;FONT color=#3333ff&gt;دایره المعارف بزرگ اسلامی&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P&gt;&lt;A href=&quot;http://www.anco-rt.ru/&quot;&gt;&lt;FONT color=#3333ff&gt;http://www.anco-rt.ru&lt;/FONT&gt;&lt;/A&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P&gt; &lt;A href=&quot;http://lakistan.persianblog.ir/post/91/&quot;&gt;&lt;FONT color=#3333ff&gt;http://lakistan.persianblog.ir&lt;/FONT&gt;&lt;/A&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P&gt; &lt;A style=&quot;COLOR: #00c; TEXT-DECORATION: underline&quot; href=&quot;http://qorveh-magazine.blogspot.com/&quot;&gt;&lt;FONT color=#3333ff&gt;http://qorveh-magazine.blogspot.com&lt;/FONT&gt;&lt;/A&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P&gt; &lt;A href=&quot;http://www.lakia.net/lak/resurce/wedding/wedding.htm&quot;&gt;&lt;FONT color=#3333ff&gt;http://www.lakia.net&lt;/FONT&gt;&lt;/A&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P&gt;&lt;A href=&quot;http://encyclopaediaislamica.com/madkhal2.php?sid=2436&quot;&gt;&lt;FONT color=#3333ff&gt;http://encyclopaediaislamica.com&lt;/FONT&gt;&lt;/A&gt;&lt;/P&gt;&lt;/DIV&gt;</description>
<pubDate>Tue, 25 Aug 2009 18:11:12 GMT</pubDate>
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<title>لیلا فریقی</title>
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<pubDate>Fri, 21 Aug 2009 17:30:00 GMT</pubDate>
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<title>بيوگرافي سیدعلی‌ اصغر کردستانی</title>
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<description>شهرت و آوازه‌ي سید ، آن مرد هنرمند نامي كرد ، جداي
از حسن و موهبت خدادادی صدایش در حالي به اوج خود رسيد كه پس ازگذشت 72
سال از وفاتش ، محمدرضاشجريان استاد بلامنازع موسيقي سنتي ايران را برآن
داشت تا ضمن اجراي آهنگ &quot;غه‌مگین و دل په‌شیوم، بروانه باری لیوم&quot; وي در
كنسرت كردستان عراق ، اين چنين درباره وي سخن بگويد: سید علی اصغر
کردستانی بدون شک از اساتید پیشاهنگ و پیشرو در زمینه آواز است و ما در
آوازهایمان از سبکهای ایشان بهره می بریم.

&lt;div&gt;&lt;div style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;div&gt;&lt;div style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;br /&gt;&lt;object height=&quot;319&quot; width=&quot;395&quot; codebase=&quot;http://download.macromedia.com/pub/shockwave/cabs/flash/swflash.cab#version=6,0,40,0&quot; classid=&quot;clsid:d27cdb6e-ae6d-11cf-96b8-444553540000&quot;&gt;&lt;param value=&quot;395&quot; name=&quot;width&quot;&gt;&lt;/param&gt;&lt;param value=&quot;319&quot; name=&quot;height&quot;&gt;&lt;/param&gt;&lt;param value=&quot;always&quot; name=&quot;allowscriptaccess&quot;&gt;&lt;/param&gt;&lt;param value=&quot;true&quot; name=&quot;allowfullscreen&quot;&gt;&lt;/param&gt;&lt;param value=&quot;http://www.youtube.com/v/2QsAAtHzd6A&amp;hl=en&amp;fs=1&amp;rel=0&amp;color1=0x006699&amp;color2=0x54abd6&amp;border=1&quot; name=&quot;src&quot;&gt;&lt;/param&gt;&lt;embed height=&quot;319&quot; width=&quot;395&quot; src=&quot;http://www.youtube.com/v/2QsAAtHzd6A&amp;hl=en&amp;fs=1&amp;rel=0&amp;color1=0x006699&amp;color2=0x54abd6&amp;border=1&quot; allowfullscreen=&quot;true&quot; allowscriptaccess=&quot;always&quot; type=&quot;application/x-shockwave-flash&quot;&gt;&lt;/embed&gt;&lt;/object&gt;&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align=&quot;justify&quot;&gt;&lt;p&gt;&lt;strong&gt;&lt;img hspace=&quot;4&quot; height=&quot;234&quot; width=&quot;160&quot; border=&quot;1&quot; align=&quot;right&quot; title=&quot;Sayd_Ali_Asghar_Kurdistani2&quot; alt=&quot;Sayd_Ali_Asghar_Kurdistani2&quot; src=&quot;http://www.kurdnews.ir/images/stories/MultiMedia/Sayd_Ali_Asghar_Kurdistani2.jpg&quot; /&gt;بيوگرافي سیدعلی‌ اصغر کردستانی&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;سال تولد: ۱۲۶۰ شمسی&lt;br /&gt;سال فوت: 1315 شمسی&lt;br /&gt;محل تولد و فوت : روستای صلوات آباد سنندج&lt;br /&gt;نام پدر: نظام الدین&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;strong&gt;خلاصه‌ي از زندگينامه سیدعلی‌ اصغر کردستانی&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;پدرش
او را از نوجوانی به مکتب یکی از مشایخ بزرگ دینی سنندج فرستاد و علی اصغر
پس از چند سال تلمذ در آن مکتب در قرائت قرآن به استادی رسید و به خاطر
صدای خوش و رسایی که داشت شهرت و آوازه اش از زادگاه و سرزمین مادری فراتر
رفت. &lt;br /&gt;صفای باطن و فروتنی سید. افزون بر حسن و موهبت خدادادی صدایش دل
های مشتاقان بسیاری را تسخیر کرد و از آنجا که انسانی بی تکبر و بخشنده
بود و نغمه های روح پرورش را بیدریغ نثار دوستدارانش می کرد دیری نپایید
که به محافل انس خوانین و بزرگان کردستان راه یافت.&lt;br /&gt;لحن محزون و بسیار
دلنشن و وسعت صدا و تحریرهای ریز پی در پی در صدای اوج از ویژگی های آواز
سید علی اصغر کردستانی است. آوای جان سوز و دلنشین او حتی شنوندگانی را که
به زبان کردی آشنا نیستند مجذوب و محظوظ می کند.&lt;br /&gt;عباس کمندی در کتاب
کوچک و مختصری که با عنوان &quot; سید علی اصغر کردستانی &quot; در سال 1364 منتشر
کرد ، نوشته است : « ... یک شب در تهران و در منزل یکی از رجال مملکتی با
حضور دولتمندان و هنرمندان و ادبای تراز اول ، جشنی بر پا می شود. سردار
اعظم ، سید را همراه با خود به آن جشن می برد. یکی از خوانندگان آن جشن ،
قمرالملوک بود ... بعد از خاتمه ی آواز قمر ، سید به وسیله ی سردار اعظم
به حاضرین معرفی و از وی تقاضای خواندن می شود... سید صدای خود را یک
بالاتر از صدای قمر وسعت داده و با تمام قدرت شروع به خواندن میکند و تمام
اهل مجلس و خصوصا موسیقیدانان را به تعجب و تحسین وا میدارد ... با مخارج
سردار اعظم ، سید خدود یک ماه در تهران ماند و در یک شرکت صفحه پرکنی به
نام پلیفون حدود سی آهنگ متفاوت ،همراه ارکستر بر صفحه ی گرامافون ضبط کرد
... از نام و نشان نوازندگان همراه وی اطلاعی در دست نیست ... صفحات سید
بعد ها در میان منتقدین کردستان پراکنده شد و به مرور به علت دست به دست
شدن زیاد ، تعدادی از آنها از بین رفت و مابقی که حدود سیزده آهنگ است ،
بعد از تاسیس رادیو سنندج در سال 1327 یا 28 از خانواده ی آصف دیوان به
دست آمد و جهت استفاده ی عموم کپی برداری شد ... آنچه از صدای سید و نحوه
ی اجرای آهنگ هایش مشخص است ، این است که سید به طور مسلم موسیقی ایرانی
را میشناخته است . اما چگونه و در کجا و با چه امکاناتی به این شناخت
رسیده ، جای بحث و گفتگوست... به نظر نگارنده چون در آن زمان و قبل از
رفتن سید به تهران ، سنندج به مدت یک سال تبعیدگاه عارف قزوینی ، شاعر و
ترانه ی سرای معروف ایران بود و چون عارف در آن مدت به منزل خوانین سنندج
به خصوص منزل آصف دیوان رفت و آمد داشت ، مثلماً صدای سید از نظر عارف
مکتوم نمانده و احتمالا جلساتی با هم داشته اند و با توجه به نحوه ی به
کار گیری تحریرات در صدای سید علی اصغر و شباهت آن با آهنگهای عارف قزوینی
و نحوه ی تحریرات به کار گرفته در آنها ، به احتمال زیاد ، سید موسیقی را
از عارف آموخته و یا حد اقل نحوه ی صوت پردازی سید ، بدون دخالت عارف
نبوده است. اگر غیر از این باشد، سید علی اصغر خود ابداع کننده ی این سبک
در موسیقی کردی است. چرا که نحوه ی خواندن سید و به کارگیری تحریرات ریز
در صدای وی مخصوص خود اوست و چنین سبکی در هیچ کجای کردستان ، به جز سنندج
و در نواحی صلوات آباد ، وجود نداشته و ندارد ... » &lt;br /&gt;&lt;img hspace=&quot;4&quot; height=&quot;302&quot; width=&quot;200&quot; border=&quot;1&quot; align=&quot;left&quot; title=&quot;Sayd_Ali_Asghar_Kurdistani1&quot; alt=&quot;Sayd_Ali_Asghar_Kurdistani1&quot; src=&quot;http://www.kurdnews.ir/images/stories/MultiMedia/Sayd_Ali_Asghar_Kurdistani1.jpg&quot; /&gt;بنا
به روایتی یك بار نیز جهت قرائت قران به مصر دعوت شد ولی به دلیل ناخوشی
پدر از رفتن صرف نظر كرد. پدرش بارها اورا از خواندن در ملا عام منع و سر
زنش كرده بود ولي سید با كمال احترام در جواب پدر گفته بود: انچه نعمت
خداست به همه تعلق دارد و نباید انرا از خلایق دریغ كرد و اگر خواندن
الحان از روی حقیقت و دستی به جانب معنویات باشد مانند صدای پرندگان خالی
از محرمات خواهد بود.&lt;br /&gt;حاج سید عبد الاحد بابا شهابی پسر بزرگ سید
می‌گوید: مرحوم پدرم با وجود اینكه هرگز نزد استادی تعلیم ندیده بود مع
الوصف عموم دستگاهها و مقامات موسیقی ایرانی را می شناخت و انچه را می
خواند یا موسیقی اصیل كردی بود و یا خود بر اساس موسیقی اصیل كردی می ساخت
واجرا می كرد.اشعاری هم كه می خواند یا اشعار فولكلور متداول محلی بود و
یا از دیوان شاعران مانند مولوی كرد وفایی مهابادی یا طاهر بگ جاف و یا
بابا طاهر همدانی انتخاب می كرد.&lt;br /&gt;استاد سید علی اصغركردستانی اهنگهای
اصیل كردی زمان خود را به سبك خود خوانده است و با تحریرات ریز صدا بر
ملودی انها افزوده است اهنگها عبارتند از: صدای زیر وبم(سه گاه ) ، &quot;غم
انگیز&quot;(شعر بابا طاهر) ، &quot;یار غزال&quot;(بیات ترك) ، &quot;زردی خزان&quot;(بیات ترك) ،
&quot;غم انگیز&quot;(افشاری) ، &quot;كورته بالا&quot; (دشتی) ، &quot;دردی هجران&quot; ، &quot;رفیقانی
طریقت&quot; ، &quot;نابی هی نابی&quot; و &quot;هروه‌ك بازوبن&quot;.&lt;br /&gt;بعضی از این اثار توسط
خوانندگاني باز خوانی شده است ، از جمله كاست زردی خزان كاری از ارسلان
كامكار ، قسمتی از كاست فلك باخه وان با صدای سید جلال الدین محمدیان و
نیز تصنیف های دردی هجران و رفیقانی طریقت و &quot;هروه‌ك بازوبن&quot;.را در این
اواخر خواننده بسیار توانا زنده یاد استاد حشمت الله لرنژاد اجرا كرده كه
در نوع خود درخور تحسین است.&lt;br /&gt;تار، كمانچه ، فلوت و ضرب از جمله سازهای بودند كه سید علی اصغر را در تمامي اهنگها همراهی كرده اند.&lt;br /&gt;وی صاحب دو پسر و دو دختر بود كه به باباشهابی معروفند.&lt;br /&gt;برگرفته از كتاب موسیقی كرمانشاه &lt;/p&gt;&lt;div style=&quot;text-align: center;&quot;&gt;&lt;table width=&quot;395&quot; cellspacing=&quot;0&quot; cellpadding=&quot;0&quot; border=&quot;0&quot; id=&quot;table1&quot; style=&quot;border-top-width: 0px; border-left-width: 0px; border-right-width: 0px;&quot;&gt;&lt;tbody&gt;&lt;tr&gt;&lt;td height=&quot;12&quot; bgcolor=&quot;#bfebff&quot; bordercolor=&quot;#000000&quot; style=&quot;border: medium none ; text-align: center;&quot; colspan=&quot;3&quot;&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style=&quot;font-size: 11pt;&quot;&gt;&lt;font face=&quot;times new roman,times&quot;&gt;دريافت قطعاتي از آثار سيد علي اصغر كردستاني&lt;/font&gt;&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/td&gt;&lt;/tr&gt;&lt;tr&gt;&lt;td height=&quot;22&quot; width=&quot;184&quot; bgcolor=&quot;#66ccff&quot; bordercolor=&quot;#000000&quot; style=&quot;border: 1px solid ; text-align: center;&quot;&gt;&lt;font face=&quot;times new roman,times&quot; size=&quot;3&quot; style=&quot;font-weight: 700; font-size: 8.5pt;&quot;&gt;نام آهنگ &lt;/font&gt;&lt;/td&gt;&lt;td height=&quot;22&quot; width=&quot;124&quot; bgcolor=&quot;#66ccff&quot; bordercolor=&quot;#000000&quot; style=&quot;border: 1px solid ; text-align: center;&quot;&gt;&lt;font face=&quot;times new roman,times&quot; size=&quot;3&quot; style=&quot;font-weight: 700; font-size: 8.5pt;&quot;&gt;حجم آهنگ&lt;/font&gt;&lt;/td&gt;&lt;td height=&quot;22&quot; bgcolor=&quot;#66ccff&quot; bordercolor=&quot;#000000&quot; style=&quot;border: 1px solid ; text-align: center;&quot;&gt;&lt;font face=&quot;times new roman,times&quot; size=&quot;3&quot; style=&quot;font-weight: 700; font-size: 8.5pt;&quot;&gt;دانلود&lt;/font&gt;&lt;/td&gt;&lt;/tr&gt;&lt;tr&gt;&lt;td width=&quot;186&quot; bordercolor=&quot;#000000&quot; style=&quot;border-bottom: 1px solid; text-align: center;&quot;&gt;&lt;font face=&quot;Tahoma&quot; style=&quot;font-size: 8.5pt;&quot;&gt;سه گاه&lt;/font&gt;&lt;/td&gt;&lt;td width=&quot;126&quot; bordercolor=&quot;#000000&quot; style=&quot;border-bottom: 1px solid; text-align: center;&quot;&gt;&lt;font face=&quot;Tahoma&quot; style=&quot;font-size: 8.5pt;&quot;&gt;2,62&lt;span&gt; &lt;/span&gt;مگابايت&lt;/font&gt;&lt;/td&gt;&lt;td bordercolor=&quot;#000000&quot; style=&quot;border-bottom: 1px solid; text-align: center;&quot;&gt;&lt;a target=&quot;_blank&quot; href=&quot;http://mmm.parsaspace.com/kordestani/04.mp3&quot;&gt;&lt;img height=&quot;19&quot; width=&quot;20&quot; border=&quot;0&quot; title=&quot;download&quot; alt=&quot;download&quot; src=&quot;http://www.kurdnews.ir/images/stories/Link_Graphic/download.gif&quot; /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/td&gt;&lt;/tr&gt;&lt;tr&gt;&lt;td width=&quot;186&quot; bordercolor=&quot;#000000&quot; style=&quot;border-bottom: 1px solid; text-align: center;&quot;&gt;&lt;font face=&quot;Tahoma&quot; style=&quot;font-size: 8.5pt;&quot;&gt;آواز ابوعطا ( حجاز )&lt;/font&gt;&lt;/td&gt;&lt;td width=&quot;126&quot; bordercolor=&quot;#000000&quot; style=&quot;border-bottom: 1px solid; text-align: center;&quot;&gt;&lt;font face=&quot;Tahoma&quot; style=&quot;font-size: 8.5pt;&quot;&gt;۲,۲۶&lt;span&gt; &lt;/span&gt;مگابايت&lt;/font&gt;&lt;/td&gt;&lt;td bordercolor=&quot;#000000&quot; style=&quot;border-bottom: 1px solid; text-align: center;&quot;&gt;&lt;a target=&quot;_blank&quot; href=&quot;http://mmm.parsaspace.com/kordestani/01.mp3&quot;&gt;&lt;img height=&quot;19&quot; width=&quot;20&quot; border=&quot;0&quot; title=&quot;download&quot; alt=&quot;download&quot; src=&quot;http://www.kurdnews.ir/images/stories/Link_Graphic/download.gif&quot; /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/td&gt;&lt;/tr&gt;&lt;tr&gt;&lt;td width=&quot;186&quot; bordercolor=&quot;#000000&quot; style=&quot;border-bottom: 1px solid; text-align: center;&quot;&gt;&lt;font face=&quot;Tahoma&quot; style=&quot;font-size: 8.5pt;&quot;&gt;آواز دشتی ( غم انگیز )&lt;/font&gt;&lt;/td&gt;&lt;td width=&quot;126&quot; bordercolor=&quot;#000000&quot; style=&quot;border-bottom: 1px solid; text-align: center;&quot;&gt;&lt;font face=&quot;Tahoma&quot; style=&quot;font-size: 8.5pt;&quot;&gt;2,70&lt;span&gt; &lt;/span&gt;مگابايت&lt;/font&gt;&lt;/td&gt;&lt;td bordercolor=&quot;#000000&quot; style=&quot;border-bottom: 1px solid; text-align: center;&quot;&gt;&lt;a target=&quot;_blank&quot; href=&quot;http://mmm.parsaspace.com/kordestani/03.mp3&quot;&gt;&lt;img height=&quot;19&quot; width=&quot;20&quot; border=&quot;0&quot; title=&quot;download&quot; alt=&quot;download&quot; src=&quot;http://www.kurdnews.ir/images/stories/Link_Graphic/download.gif&quot; /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/td&gt;&lt;/tr&gt;&lt;tr&gt;&lt;td width=&quot;186&quot; bordercolor=&quot;#000000&quot; style=&quot;border-bottom: 1px solid; text-align: center;&quot;&gt;&lt;font face=&quot;Tahoma&quot; style=&quot;font-size: 8.5pt;&quot;&gt;دردي هجران&lt;/font&gt;&lt;/td&gt;&lt;td width=&quot;126&quot; bordercolor=&quot;#000000&quot; style=&quot;border-bottom: 1px solid; text-align: center;&quot;&gt;&lt;font face=&quot;Tahoma&quot; style=&quot;font-size: 8.5pt;&quot;&gt;3,01&lt;span&gt; &lt;/span&gt;مگابايت&lt;/font&gt;&lt;/td&gt;&lt;td bordercolor=&quot;#000000&quot; style=&quot;border-bottom: 1px solid; text-align: center;&quot;&gt;&lt;a target=&quot;_blank&quot; href=&quot;http://mmm.parsaspace.com/kordestani/02.mp3&quot;&gt;&lt;img height=&quot;19&quot; width=&quot;20&quot; border=&quot;0&quot; title=&quot;download&quot; alt=&quot;download&quot; src=&quot;http://www.kurdnews.ir/images/stories/Link_Graphic/download.gif&quot; /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/td&gt;&lt;/tr&gt;&lt;tr&gt;&lt;td width=&quot;186&quot; bordercolor=&quot;#000000&quot; style=&quot;border-bottom: 1px solid; text-align: center;&quot;&gt;&lt;font face=&quot;Tahoma&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-size: 8.5pt;&quot;&gt;یار غزال&lt;/span&gt;&lt;/font&gt;&lt;/td&gt;&lt;td width=&quot;126&quot; bordercolor=&quot;#000000&quot; style=&quot;border-bottom: 1px solid; text-align: center;&quot;&gt;&lt;font face=&quot;Tahoma&quot; style=&quot;font-size: 8.5pt;&quot;&gt;2,51&lt;span&gt; &lt;/span&gt;مگابايت&lt;/font&gt;&lt;/td&gt;&lt;td bordercolor=&quot;#000000&quot; style=&quot;border-bottom: 1px solid; text-align: center;&quot;&gt;&lt;a target=&quot;_blank&quot; href=&quot;http://mmm.parsaspace.com/kordestani/05.mp3&quot;&gt;&lt;img height=&quot;19&quot; width=&quot;20&quot; border=&quot;0&quot; title=&quot;download&quot; alt=&quot;download&quot; src=&quot;http://www.kurdnews.ir/images/stories/Link_Graphic/download.gif&quot; /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/td&gt;&lt;/tr&gt;&lt;tr&gt;&lt;td width=&quot;186&quot; bordercolor=&quot;#000000&quot; style=&quot;border-bottom: 1px solid; text-align: center;&quot;&gt;&lt;font face=&quot;Tahoma&quot;&gt;&lt;span style=&quot;font-size: 8.5pt;&quot;&gt;زردی خزان&lt;/span&gt;&lt;/font&gt;&lt;/td&gt;&lt;td width=&quot;126&quot; bordercolor=&quot;#000000&quot; style=&quot;border-bottom: 1px solid; text-align: center;&quot;&gt;&lt;font face=&quot;Tahoma&quot; style=&quot;font-size: 8.5pt;&quot;&gt;2,81&lt;span&gt; &lt;/span&gt;مگابايت&lt;/font&gt;&lt;/td&gt;&lt;td bordercolor=&quot;#000000&quot; style=&quot;border-bottom: 1px solid; text-align: center;&quot;&gt;&lt;a target=&quot;_blank&quot; href=&quot;http://mmm.parsaspace.com/kordestani/06.mp3&quot;&gt;&lt;img height=&quot;19&quot; width=&quot;20&quot; border=&quot;0&quot; title=&quot;download&quot; alt=&quot;download&quot; src=&quot;http://www.kurdnews.ir/images/stories/Link_Graphic/download.gif&quot; /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/td&gt;&lt;/tr&gt;&lt;/tbody&gt;&lt;/table&gt;&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;</description>
<pubDate>Fri, 21 Aug 2009 17:19:28 GMT</pubDate>
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<title>آهنگ کردي (خواننده هاي زن)</title>
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<description>امروز چند تا آهنگ توپ کردي از مرضيه و ليلا فريقي،چوپي فتاح و دلينا رزازي رو براتون گذاشتم که اميدوارم خوشتون بياد&lt;/p&gt;
&lt;br /&gt;&lt;p&gt;مرضيه فريقي&lt;br /&gt;&lt;a target=&quot;_blank&quot; href=&quot;http://p-derakhshani.persiangig.com/audio/Kurdi-016-Marzeyh%201.mp3&quot;&gt;&lt;font color=&quot;#22229c&quot;&gt;Kurdi-016-Marzeyh 1&lt;/font&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;a target=&quot;_blank&quot; href=&quot;http://p-derakhshani.persiangig.com/audio/Kurdi-017-Marzeyh%202.mp3&quot;&gt;&lt;font color=&quot;#22229c&quot;&gt;Kurdi-017-Marzeyh 2&lt;/font&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;چوپي فتاح&lt;br /&gt;&lt;a target=&quot;_blank&quot; href=&quot;http://p-derakhshani.persiangig.com/audio/Kurdi-018-Chopy%20fatah%201.mp3&quot;&gt;&lt;font color=&quot;#22229c&quot;&gt;Kurdi-018-Chopy fatah 1&lt;/font&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;a target=&quot;_blank&quot; href=&quot;http://p-derakhshani.persiangig.com/audio/Kurdi-019-Chopy%20fatah%202.mp3&quot;&gt;&lt;font color=&quot;#22229c&quot;&gt;Kurdi-019-Chopy fatah 2&lt;/font&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;دلنيا رزازي&lt;br /&gt;&lt;a target=&quot;_blank&quot; href=&quot;http://p-derakhshani.persiangig.com/audio/Kurdi-020-Delnia%20razazi%201.mp3&quot;&gt;&lt;font color=&quot;#22229c&quot;&gt;Kurdi-020-Delnia razazi 1&lt;/font&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;a target=&quot;_blank&quot; href=&quot;http://p-derakhshani.persiangig.com/audio/Kurdi-021-Delnia%20razazi%202.mp3&quot;&gt;&lt;font color=&quot;#22229c&quot;&gt;Kurdi-021-Delnia razazi 2&lt;/font&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ليلا فريقي&lt;br /&gt;&lt;a target=&quot;_blank&quot; href=&quot;http://p-derakhshani.persiangig.com/audio/Kurdi-022-Leyla%20farigi%201.mp3&quot;&gt;&lt;font color=&quot;#22229c&quot;&gt;Kurdi-022-Leyla farigi 1&lt;/font&gt;&lt;/a&gt;&lt;/p&gt;

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<pubDate>Fri, 21 Aug 2009 17:17:01 GMT</pubDate>
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<title>شیرازی</title>
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<description>رهگذرای خسته وقتی میان به شیراز&lt;BR&gt;از بوی گل عاشق میشن پر می گیرن به پرواز&lt;BR&gt;حس میکنن از شوق عشق از این شراب ناب از این ساز&lt;BR&gt;از دیده دل باخته میشن به این شهر پرآواز&lt;BR&gt;شیراز شیراز هی شهر گل و ساز&lt;BR&gt;شعر از تو شد آغاز&lt;BR&gt;در خاک تو این سینه گم میکنه عشق و شد چون راز&lt;BR&gt;شیراز شیراز عشق از تو شد آغاز&lt;BR&gt;شیراز بودی و گلا رو وقت بهار میدیدی&lt;BR&gt;از قلب مردمونش غنچه مهر بچینی&lt;BR&gt;عاشق بشی دو بار تو باغ گل بشینی&lt;BR&gt;از این شراب به این شیرینی&lt;BR&gt;مستی به سر بیاری و دنیا رو خوب ببینی&lt;BR&gt;شیراز شیراز هی شهر گل و ساز&lt;BR&gt;شعر از تو شد آغاز&lt;BR&gt;ستاره های شیراز نور شبای عشقه&lt;BR&gt;شعرهای ناب حافظ ترانه های عشقه&lt;BR&gt;عشق و صفا نوشته رو برگ آسمونش&lt;BR&gt;توی دلهای پاک مردم مهربونش&lt;BR&gt;معنی شعر و شوره برگ گلهای شیراز&lt;BR&gt;خدای شهر شیراز خدای مردمونش&lt;BR&gt;زنجیر اسم شیراز بسته به پای عشقه&lt;BR&gt;شیراز شیراز هی شهر گل و ساز&lt;BR&gt;شعر از تو شد آغاز</description>
<pubDate>Sat, 15 Aug 2009 21:15:54 GMT</pubDate>
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<title>شیراز؛ کانون پیوند شرق و غرب</title>
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<description>&lt;H2&gt;&lt;FONT face=&quot;courier new, courier, mono&quot; size=2&gt;مانا کیانی: گوته ادیب آلمانی، که «دیوان غربی - شرقی» خود را تحت تأثیر «دیوان حافظ» سرود، فصل دوم آن را با نام «حافظ‌‌نامه» و به اشعاری در مدح حافظ اختصاص داد که از جمله‌ آن‌ها می‌توان به دو شعر زیر اشاره کرد: &lt;BR&gt;حافظا، در غزل‌هایت می‌شنوم که شاعران را بزرگ داشته‌ای&lt;BR&gt;بنگر که اینک پاسخی فراخورت می‌دهم: &lt;BR&gt;بزرگ اویی است که این سپاس به بزرگداشت اوست. &lt;BR&gt;خود را با تو برابر گرفتن، حافظا راستی که دیوانگی است! &lt;BR&gt;کشتی‌ای پر شتاب و خروشان به پهنه‌ پر موج دریا در می‌آید &lt;BR&gt;و مغرور و دلیر به دلِ خیزاب‌ها می‌زند. &lt;BR&gt;آن و دمی است که اقیانوس درهم‌اش بشکند. &lt;BR&gt;ولی این تخته‌بند پوده هم‌چنان به پیش می‌راند. &lt;BR&gt;در غزل‌های سبک‌خیز و تندآهنگ تو خنکای سیال دریا است، و فورانِ کوه‌وار آتش نیز. &lt;BR&gt;و گدازه‌ها مرا در خود غرق می‌کنند. &lt;BR&gt;با این همه خیالی نیز درونم را می‌آکند و شجاعت‌ام می‌بخشد. &lt;BR&gt;مگر نه آن‌که من نیز در سرزمینِ خورشید زیسته و عشق ورزیده‌ام! &lt;BR&gt;&lt;BR&gt;گروهی ازعلاقه‌مندان به فرهنگ و هنر شرق در آلمان به دعوت «فستیوال دیوان شرق- غرب وایمار» به سرپرستی کلاوس گالاس، در سفر پنج روزه خود به استان فارس در برنامه‌های مختلفی نظیر بازدید از اماکن گردشگری و فرهنگی شیراز و فارس، دیدار با مسئولان شهرداری شیراز و شورای شهر و... شرکت کردند. &lt;BR&gt;&lt;BR&gt;کلاوس گالاس در رأس هیأتی 30 نفره از چهره‌های برجسته وایمار متشکل از اندیشمندان، هنرمندان و فرهنگیان آلمان در جریان مراسم بزرگداشت حافظ و گوته در جوار آرامگاه حافظ، بر بهبود روابط خواهرخواندگی دو شهر وایمار و شیراز تأکید کرد و از پیش‌بینی برنامه‌های مختلفی برای ارتقای تعاملات فرهنگی خبر داد. &lt;BR&gt;&lt;BR&gt;گالاس تعلق خاطر خود را به شهر شیراز مطرح کرد. او 30سال پیش زمانی که دانشجو بود به شیراز سفر کرد و این شهر او را مجذوب خود کرد و از همان موقع نیز به خوبی درک کرد که شیراز و فارس قلب و پایتخت فرهنگی ایران است. &lt;BR&gt;مشاور فرهنگی شهردار شهر وایمار از همان زمان در خود اندیشه ایجاد رابطه فرهنگی بین این دو شهر را می‌پروراند تا اینکه امروز موفق شد این کار را به مرحله اجرا درآورد. &lt;BR&gt;&lt;BR&gt;این گروه 30 نفره در بدو ورود به آرامگاه حافظ به همان اندازه که مقبره این شاعر برجسته برایشان جذاب بود، پوسترهای مراسم نیز برای آنها ایجاد جذابیت می‌کرد به گونه‌ای که با هر عکسی که از آرامگاه می‌گرفتند چند عکس نیز از پوستر مراسم و تریبون برنامه تهیه می‌کردند. &lt;BR&gt;&lt;BR&gt;«رنه برگ» پیش از اجرای برنامه حافظ خوانی در سخنانی کوتاه و به زبان فارسی گفت: شعر فارسی در من اثری عمیق دارد و امیدوارم از شنیدن شعر حافظ لذت ببرید. &lt;/FONT&gt;&lt;/H2&gt;
&lt;DIV class=news-lead&gt;
&lt;DIV class=news-content&gt;
&lt;P&gt;&lt;STRONG&gt;شهردار شیراز: حافظ و گوته توانسته‌اند فلسفه شرق و غرب را با یکدیگر پیوند دهند&lt;/STRONG&gt;&lt;BR&gt;شهردار شیراز از حافظ و گوته به عنوان پیونده‌دهنده فلسفه شرق و غرب عالم یاد کرد. مهران اعتمادی در مراسم بزرگداشت حافظ و گوته در آرامگاه حافظ افزود: این دو شخصیت برجسته شیرازی و آلمانی به خوبی توانسته‌اند نه تنها فلسفه شرق و غرب را با یکدیگر پیوند دهند بلکه موفق شده‌اند پیوندی فرهنگی و عمیق بین دو شهر شیراز و وایمار ایجاد کنند. &lt;BR&gt;&lt;BR&gt;وی با اشاره به اینکه در شیراز به غیر از حافظ شخصیت‌های بزرگ فرهنگی دیگری نیز وجود دارند، عنوان کرد: سعدی که در جهان با نصیحت‌ها و پندهایش زبانزد است و ملاصدرا که در حوزه فلسفه شرق نزد همگان جایگاهی والا دارد و یا خواجوی کرمانی که عشق و محبت را از حافظ آموخت و به دیگران یاد داد همگی شخصیت‌هایی هستند که در این شهر زیسته و منبع آموزش‌های زیادی برای شهروندان شده‌اند.&lt;BR&gt;&lt;BR&gt;شهردار شیراز خطاب به هیأت فرهنگی آلمانی نیز بیان کرد: ما از شما انتظار داریم سفیران محبت و دوستی باشید و پیام عشق و محبت ما را به آن سوی جهان و آلمان نیز ببرید. &lt;BR&gt;&lt;BR&gt;اعتمادی در انتها با اشاره به موقعیت جغرافیایی آرامگاه حافظ نیز بیان کرد: دانشکده‌های ادبیات و زبان فارسی نیز در جوار حافظیه قرار گرفته و در این محیط فرهنگی است که دانشجویان با فرهنگ و ادب این سرزمین آشنا شده و آن را در سراسر جهان منتشر می‌کنند. &lt;BR&gt;&lt;BR&gt;در ادامه مراسم یک عضو شورای شهر شیراز نیز ضمن تأکید بر لزوم توسعه روابط فرهنگی بین شیراز و وایمار بیان کرد: شیراز علاقه‌مند به توسعه این ارتباطات فرهنگی است و امیدواریم این امر همچنان با قدرت بیشتری ادامه یابد. &lt;BR&gt;&lt;BR&gt;مهدی خانی در ادامه سخنان خود عنوان کرد: حافظ خوانی فرصتی برای بازشناسی خود است و حضار در این جلسه می‌توانند از این فرصت استفاده کرده و در شرایطی که حول آرامگاه جمع شده‌ایم خود را بیش از گذشته دریابیم.&lt;BR&gt;&lt;BR&gt;وی اظهار داشت: ادبیات و شعر حافظ مجموعه‌ای بوده که نشان می‌دهد حافظ در چه زمانی چه شرایطی داشته و در پی این شناخت، بشر می‌تواند از آن شرایط و وضعیت برای زندگی خود الهام بگیرد.&lt;/P&gt;
&lt;P&gt;&lt;STRONG&gt;کلاوس گالاس: حافظ به وسیله گوته به ادبیات آلمان شناخته شد&lt;/STRONG&gt;&lt;BR&gt;مشاور فرهنگی شهردار وایمار از برگزاری کنسرت ارکستر سمفونی وایمار در تخت جمشید و برگزاری جشنواره حافظ و گوته در شیراز به عنوان برنامه‌های مهم شیراز و وایمار برای توسعه و بهبود روابط فرهنگی این دو شهر یاد کرد. &lt;BR&gt;&lt;BR&gt;کلاوس گالاس در حاشیه مراسم بزرگداشت حافظ و گوته در شیراز در جمع خبرنگاران افزود: قرار بود اجرای ارکستر وایمار در همین ایام صورت گیرد که به خاطر انتخابات ایران میسر نشد اما امیدواریم در آینده‌ای نزدیک این برنامه نیز تدارک دیده شود.&lt;/P&gt;
&lt;P&gt;وی عنوان کرد: از جمله برنامه‌هایی که برای ارتقای این روابط فرهنگی بین شیراز و وایمار پیش‌بینی شده حضور شهردار شیراز و اعضای این سازمان در شهر وایمار بوده و به خاطر اینکه فقط برنامه‌های پیش‌بینی شده فرهنگی نباشد مقرر شده که حوالی 18نوامبر یک تیم از فوتبال نوجوانان شیراز به وایمار سفر کرده و بازی‌های دوستانه‌ای انجام دهند.&lt;BR&gt;&lt;BR&gt;این شرق شناس آلمانی در پاسخ به این پرسش که «آیا به همان میزان که مردم شیراز و ایران با گوته آشنایی دارند مردم وایمار نیز حافظ را می‌شناسند»، بیان کرد: حافظ به وسیله گوته به ادبیات آلمان شناخته شد و گوته آنقدر مجذوب این شخصیت شیرازی بود که دیوان شرق و غرب خود را به خاطر حافظ خلق کرد.&lt;BR&gt;&lt;BR&gt;وی عنوان کرد: گوته هیچ‌گاه به شیراز سفر نکرده اما در دیوان خود بارها معشوقه خود را به نام زلیخا همان معشوقه‌ای که حافظ در آثار خود نام برده یاد کرده است.&lt;BR&gt;&lt;BR&gt;گالاس همچنین در پاسخ به این سئوال که «آیا برای حافظ در شهر وایمار و آلمان ساخت پژوهشکده‌ای نیز پیش‌بینی شده است»، اظهار داشت: در زمان ریاست جمهوری محمد خاتمی وی به وایمار سفر کرده و با حضور او جایگاهی برای حافظ افتتاح شد و از آن زمان تاکنون اتفاق جدیدی صورت نگرفته اما هردوی ما امیدواریم با از سرگیری این روابط فرهنگی بتوانیم در این راستا اقدامات مطلوبی را انجام دهیم. &lt;BR&gt;&lt;BR&gt;وی همچنین گفت: البته برنامه‌های دیگری نیز برای حافظ و گوته در نظر گرفته شده که می‌توان از برگزاری فستیوال حافظ و گوته مقارن سال آینده در شیراز یاد کرد.&lt;/P&gt;
&lt;P&gt;&lt;STRONG&gt;رونمایی از نماد حافظ و گوته پیشنهاد شد&lt;/STRONG&gt; &lt;BR&gt;در سفری که هیأت فرهنگی کشور آلمان به شیراز داشتند ساخت نماد حافظ و گوته و رونمایی از آن در دو شهر وایمار و شیراز پیشنهاد شد.&lt;BR&gt;&lt;BR&gt;نایب رئیس شورای اسلامی شهر شیراز در نشستی که با حضور مدیر فرهنگی سفارت آلمان در ایران و هیأت 30 نفره آلمانی برگزار شد، گفت: شورای شهر شیراز بنا را بر ایجاد ارتباط گسترده بین این دو شهر و شهرهای بزرگ دنیا قرار داده و در این راستا تلاش می‌کند با تعاملات فرهنگی زمینه لازم را برای تحقق این امر فراهم کند. &lt;BR&gt;&lt;BR&gt;مهدی خانی با بیان اینکه در این خصوص تاکنون بستر لازم برای خواهر خواندگی شیراز با شهرهای مختلف در آسیای شرقی و اروپا فراهم شده است، تصریح کرد: ارتباط شیراز با وایمار خارج از هرنوع رابطه دوستانه و خواهرخواندگی یک ارتباط فرهنگی قدیمی بوده و حافظ و گوته پیوند‌دهنده دو سرزمین شرق و غرب هستند. وی ادامه داد: با توجه به قدمت این ارتباط ادبی بین دو چهره برجسته پیشنهاد می‌شود نماد حافظ و گوته در دو کشور آلمان و ایران ساخته و سال آینده به طور همزمان در دو شهر شیراز و وایمار رونمایی شود. &lt;BR&gt;&lt;BR&gt;در ادامه این نشست مدیر بخش فرهنگی سفارت آلمان در ایران ضمن استقبال از پیشنهاد رونمایی نماد حافظ و گوته در وایمار و شیراز بر تداوم فرهنگی این دو شهر تأکید کرد. خانم ریکن افزود: من به عنوان نماینده آلمان از هرگونه رابطه فرهنگی بین دو شهر شیراز و وایمار استقبال کرده و آمادگی سفارت آلمان را برای ایجاد هرنوع رابطه فرهنگی که منجر به ارتباط گسترده این دو شهر شود، اعلام می‌کنم.&lt;/P&gt;
&lt;P&gt;وی تصریح کرد: میهمان نوازی مسئولان و شیرازی‌ها بهترین پل ارتباطی دو کشور ایران و آلمان به شمار می‌رود. در راستای اخذ قرارداد خواهر خواندگی شیراز و وایمار آلمان و به منظور توسعه روابط فرهنگی این دو شهر یک گروه 30 نفره متشکل از اندیشمندان و فرهنگیان روز دوشنبه 25 خردادماه به شیراز سفر کردند.&lt;/P&gt;&lt;/DIV&gt;&lt;/DIV&gt;</description>
<pubDate>Sat, 15 Aug 2009 21:12:39 GMT</pubDate>
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<title>پاسداري از زبان كردي؛ گفتگو با ظاهر سارایی</title>
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<description> طاهر سارايي
&lt;P dir=rtl align=justify&gt;&lt;A href=&quot;mailto:Saraei_z@yahoo.com&quot;&gt;Saraei_z@yahoo.com&lt;/A&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=justify&gt; &lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=justify&gt;·        براي شروع بفرماييد اصولاً زبان كردي رايج در ايلام چه جايگاهي در بين ديگر زبان هاي كردي دارد؟&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=justify&gt;واقعيت آن است كه به دليل گسترگي و تنوع بسيار در زبان كردي ، كردها عمدتاً به چهار شاخه ي متفاوت و مشخص حرف مي زنند . كردهاي تركيه و قسمتي ازكردهاي عراق به كردي كرمانجي تكلم مي كنند . بخش بيشتر كردهاي عراق و قسمت عمده اي از كردهاي ايران به كردي سوراني سخن مي گويند و اين كردها در استان هاي كردستان و قسمت هايي از آذربايجان غربي و كرمانشاه زندگي مي كنند . در منطقه ي اورامانات كردي اورامي يا هورامي رواج دارد كه البته در مقايسه با ديگر كردها جمعيت انبوهي را تشكيل نمي دهند . و نهايتاً قسمت ديگر كردها ، كردهاي جنوبي هستند كه در قسمت هاي عمده اي از ايلام ، كرمانشاه ،و مناطقي از عراق همچون بدره و مندلي و خانقين و محلاتي از بغداد زندگي مي كنند و مي بايد جمعيت لك نشين ايلام و لرستان و كرمانشاه و ساير استان هاي غربي را به اين شاخه از كردها افزود .&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=justify&gt;·              چرا مي گويند « كردهاي جنوبي» ؟&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=justify&gt;راستش اين اصطلاح دقيقي نيست ، از سر ناچاري است و تا يافتن و پذيرش اصطلاح دقيق‌تر همين تركيب، بد نيست . در زمان ها و مكان هاي مختلف،  اين زبان از كردي ، نام هاي مختلف داشته است . در اعصار گذشته زبان و مخصوصاً زبان معيار شعري آن « گوراني » نام داشته است كه اين واژه به معناي « ترانه و تصنيف » در نزد ما آشناست . طوايف كلهر ساكن در ايوان و اسلام آباد  وگيلان غرب اين زبان را كلهري مي نامند كه البته كساني چون  بدليسي و ديگران نيز به اين نام اشاره كرده اند . در عراق اين زبان به نام « كردي فيلي » معروف است و آن هم ماجرايي دارد . كردهاي مهاجر ايلامي ساكن در عراق مخصوصا ً بغداد خود را كرد فيلي معرفي مي كردند يعني كردهايي كه زير فرمان واليان موسوم به « فيلي » اداره مي شوند . اين نام به دليل نقش و نفوذي كه كردهاي شيعه مذهب عراق در معادلات سياسي و فرهنگي عراق داشتند رايج شد  و گسترش عامي در عراق و جهان ،خاصه اروپا يافت . به گونه اي كه درخارج از ايران كردهاي جنوبي رابيشتر به نام كردهاي فيلي مي شناسند . طوايفي از گوران ها در استان كرمانشاه زندگي مي كنند كه خود را زبان خود را گوراني مي خوانند و منظورشان همين كردي جنوبي است . لك ها هم كه خود را« قوم لك » مي نامند . در سال هاي اخير تلاش هايي در جهت جا انداختن كردي كلهري به جاي كردي جنوبي صورت گرفته است كه البته چندان با كاميابي همراه نبوده است . زيرا اين يك اسم طايفه اي است  و ديگر كردهاي جنوبي مانند فيلي هاي عراق ، و ايران كه عمده ي شهروندان ايلامي و طوايف بزرگ آن را تشكيل مي دهند به آساني اين نام را نمي پذيرند و تا آن جا كه شنيده ام كرمانشاهي ها هم  با اين اسم مشكل دارند . راه برون رفت از اين  مشكل آن است كه به اسم عام تري بينديشيم كه ما كوشيده ايم اصطلاح « كردي جنوبي » را بيشتر به كاربگيريم كه همه ي مناطق كردنشين را شامل شود و البته  تا حدود زيادي هم اين نام پذيرش يافته است . با اين وصف فكر مي كنم بتوان به نام دقيق تري دست يافت كه جامع و مانع باشد . مثلا ً همين اصطلا ح كردي جنوبي به دليل مقيد بودن به جهت جغرافيايي تا حدي جامع نيست ؛ تكليف اهالي بيجار و قروه و كردهاي ساكن درحاشيه ي درياي خزر و جاهاي ديگر چيست ؟ دراين جا مي خواهم يك پيشنهاد بكنم گرچه مي دانم كه مخالفت هايي را هم ممكن است در پي داشته باشد و آن پيشنهاد « كردي گوراني » به جاي همه ي نام گذاري هاي پيشين است .&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=justify&gt;·        كردي جنوبي ، چه پيشينه ي تاريخي و فرهنگي اي دارد؟&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=justify&gt;كردي جنوبي ، با نام كردي گوراني،  قدمتي شايد كمي كهن تر از زبان و ادبيات فارسي دري يا فارسي نو دارد . منطقه ي غرب ايران به ويژه نواحي ايلام و كرمانشاه و اورامانات در طول تاريخ پايگاه و پناهگاه نحله ها و فرقه هايي بوده اند كه گرايش هاي متفاوت ديني و مذهبي با قرائت رسمي حاكم بر ايران داشته اند . مهرپرستان و زنادقه ومزدكيان و خرم دينان وپس از آن يارسان اهل حق در اين منطقه بوده اند و در پناه كوه هاي سركش زاگرس ازتعرض و تعقيب اربابان قدرت و سلطه در امان مانده اند . و اتفاقاً استان هاي ايلام ومناطقي از كرمانشاه ولرستان پناهگاه فرقه هايي از شيعيان بوده اند كه بعدها در جريان به قدرت رسيدن سلسله ي صفويه نقش بارزشان در لشكركشي هاي شاه اسماعيل محرز است و استاد سلطاني در كتاب « قيام علويان زاگرس » اين نكته را به روشني توضيح داده است . گفتم كه مناطق غربي پناهگاه دگرانديشان مذهبي بوده است و از اين جهت رد پاي اكثر آيين هاي كهن را در باورهاي اين منطقه مي توان يافت . زبان اكثر اين دگرانديشان مذهبي دست كم تا قرن هاي دوم وسوم هجري قمري همين كردي جنوبي بوده است كه به نام گوراني در متون معروف است . بزرگان يارسان تأملات مذهبي و عرفاني خود در قالب مثنوي هاي ده هجايي كردي گوراني بيان مي كرده اند كه دفاتر سرانجام اهل حق گواهي آشكار بر اين ادعا است . بهلول ماهي در قرن دوم سرسلسه است و ديگران همچون بابا نجوم  و سرهنگ دودان و بقيه ي بزرگان و معاريف  راه را ادامه داده اند . پس كردي جنوبي يا گوراني قديمي ترين زبان مطرح ، معيار و ادبي كرده بوده است . من و كامران محمد رحيمي درطرح پژوهشي « تاريخ ادبيات استان ايلام » مفصل به اين بحث پرداخته ايم كه البته اين نوشتار مدت هاست به پايان رسيده و فعلاً در قفسه ي  معاونت  پژوهشي ارشاد منتظر تصميات لازمه است . و اين را هم اضافه كنم كه زبان كردي جنوبي در قرن هاي بعد علاوه بر اين كه محملي براي بيان تأملات مذهبي يارسان بود مورد توجه ديگر شاعران دربيان همه ي دردها و دغدغه ها قرار گرفت و شاعران بزرگي به اين زبان شعر گفتند كه از آن جمله است ملا پريشان دينوري ، خان الماس كندوله اي ، ملا شفيع كليايي ، خاناي قبادي ، غلام رضا خان اركوازي ، شاكه و خان منصور، منوچهرخان كوليوند ، ملا حقعلي سياهپوش  ، نجف و تركه و شمارديگري از شاعران در تمام نواحي كردنشين . زيرا تا آن جا كه مي دانم حتي شاعران سوراني زبان هم عمدتأ شعرهايشان را به اين زبان سروده اند ، چرا كه زبان معيار ادبي و مذهبي كرده بوده است و در طول تاريخ قداستي مذهبي هم داشته است . اين كه امروزه شاهديم ديگر زبان هاي كردي محوريت يافته اند به دلايل سياسي و اجتماعي بوده است كه شايد براي كردهاي جنوبي چندان اولويتي نداشته است . و نهايتاً در اتمام اين بحث از موضوع ، جالب است اين موضوع را باز يادآور شوم كه كردي جنوبي زبان كردهاي شيعه مذهب است و يارسان را نيز بايد در اين گروه به حساب آورد .&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=justify&gt; &lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=justify&gt;·        كردي جنوبي در شعرو ادبيات معاصر چه تحركي داشته است ؟&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=justify&gt;كردي جنوبي در قرن اخير چندان پرتحرك نبوده وجاي خود را در محوريت زبان ادبي به كردي سوراني و تاحدي كرمانجي سپرده است و به دليل عدم حساسيت در مسائل و معادله هاي جديد قدرت و سياست شايد در خود نيازي به بازسازي و نوسازي نمي ديده است . و البته اين بدين معنا نيست كه هيچ كوشايي اي نداشته است . به هرحال عده اي نگذاشته اند اين چراغ خاموش بماند و در اين ميان نقش كردهاي فيلي عراق بارزتر است كه در جريان فعاليت هاي سياسي روز عراق بوده اند . اما در يكي دو دهه ي اخير كردها ي جنوبي در همه جا درصدد بازخواني و بازكاوي گذشته و تلاش براي حضور در حال و برنامه ريزي براي آينده بوده اند . شاعران  كوشيده اند تجربيات و تأملات خود را در عرصه ي شعر و ادبيات به حوزه ي كردي جنوبي بكشانند و آن را پر بار كنند . نمونه اش همين ايلام خودمان است كه شاعران خوب و بسيارش در كنار دفاتر شعر فارسي دفتري به كردي نيز شيرازه بسته اند كه به زعم من اين دفاتر شعر كردي گاه پربارتراز بقيه است  و روزبه روز اين فربهي شعر كردي در ايلام بيشتر مي شود و جالب آن كه شاعران ما اين شعرها را از سرتفنن نمي سرايند بلكه به عنوان شعري جدي و پيشرو بدان مي نگرند و مي كوشند آن را از حيث ساخت و محتوا با جريات شعري و ادبي جهان همراه  و هم‌سو كنند . در اين جا يك خاطره به ذهنم آمد كه در يك سمينار فرهنگي كه به بهانه ي بررسي زبان و ادبيات كردي جنوبي، استاداني از سراسر مناطق مختلف كردنشين حضور داشتند يكي از استادان دانشگاه خانقين به نام دكتر گرمياني  در بررسي تحولات شعر كردي جنوبي و اثبات نوآوري و نوآمدگي آن ، همين شعرهاي بچه هاي ايلام را مثال مي آورد و كلاً‌ به استناد شعرشاعران ايلامي  مقاله ي خود را ارائه كرد كه اتفاقاً يكي از مقالات مطرح آن سمينار بود . منظورم اين است كه گاه ما عظمت كاري را به دليل همجواري و عادت كمتر درك مي كنيم . تحول و تحرك در شعر جنوبي واقعاً اتفاق افتاده است . آن چه گفتم بيشتر اشاره به شعر شاعران كردي سراي ايلامي داشت حال اگر شاعران تواناي ايوان ، گيلان غرب - مخصوصا ً سعيد عبادتيان - ، و شاعران كرمانشاه و نواحي لك نشين نيز به اين فهرست اضافه گردد اهميت كار بيشتر مشخص مي شود . شاعران ما هم كميت شعرشان قابل توجه است و هم كيفت شعرشان . و مي كوشند درريخت و محتواي آن تحول ايجاد كنند و جريانات مدرن و پست مدرن را نيز به آن بكشانند و در كار خود موفق هم بوده اند . &lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=justify&gt;·              آيا زبان كردي جنوبي همين توفيق را در نثر و ادبيات داستاني داشته است ؟&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=justify&gt;متأسفانه خير . كردي جنوبي در اعصار پيش هموار زبان شعر بوده است . اما در دوره ي كنوني اين ضرورت كاملأ حس مي شود زيرا امكان نوشتن به كردي در رسانه هاي گروهي و پايگاه ها ي الكترونيكي فراهم شده است ومخصوصاً در اينترنت اين امكان آسان تر ، كم هزينه تر و زيباتر است . هر كسي مي تواند به سادگي صفحاتي به خود اختصاص دهد و در سطح جهان مخاطبان خود را داشته باشد .علاوه بر آن ، در سال هاي اخير در مناطق كردنشين نشريان دوزبانه ي متعددي فعال شده اند كه صفحاتي از آن را به نوشتار كردي اختصاص مي دهند . براي نوشتن اين صفحات لازم است كه نثر كردي جنوبي سامان بگيرد و اصولي براي آن تدوين گردد . كامران محمد رحيمي در شماره هاي گسترده اي در هفته نامه ي پيك ايلام در اين راستا تلاش هايي ارجمند مبذول كرد و در نواحي ديگر هم كوشش هايي به عمل آمده است كه ارجمند ترين كار مجله اي است به نام « گول سوو» كه در بغداد چاپ مي شود و از طريق سايت اينترنتي      &lt;A href=&quot;http://www.shafaaq.com/&quot;&gt;www.shafaaq.com&lt;/A&gt;  قابل دسترسي است . ساده ترين ضرورتي كه فعلاً براي ما پيش آمده بخش اخبار كردي سيماي ايلام است كه ماجرايي دارد واگرلازم بود به آن اشاره اي خواهم داشت .&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=justify&gt; &lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=justify&gt; &lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=justify&gt;·              به نظر شما نمي شود كردي جنوبي را با همين رسم الخط متعارف نوشت ؟&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=justify&gt;به دور از هرگونه تعصب و غرض و مرضي اعلام مي كنم كه واقعاً نمي شود، زيرا در كردي جنوبي واج ها و به تعبير غير تخصصي حرف هايي وجود دارد كه با اين رسم الخط متعارف نشان داده نمي شود كه از آن جمله است «لام» و« را» و«فا»ي كردي و ياي مجهول و نظايرآن . مخصوصا ً اين كه ما مصوتي داريم كه معادل واج   «  Ö/ Ü » بعضي از زبان هاي اروپايي است و در فارسي و حتي ديگر زبان هاي كردي شناخته شده نيست . برايم قابل تصور نيست كه مجريان برنامه هاي كردي صدا و سيماي ايلام چه جور مي توانند با شعبده گري متن هاي كردي خود را بنويسند و بخوانند بدون كه از رسم الخط كردي استفاده كنند . نظر به اين ضرورت ديده ايم كه اقبال شاعران و اهل قلم ايلام و ديگر مناطق به استفاده از آوانوشت كردي بوده است زيرا به هر حال علمي و منطبق بر قواعد زبان شناسي است و آموزش و يادگيري آن بسيار ساده است . من به تجربه دريافته ام كه براي آموزندگان متوسط ، آموزش اين آوانوشت حدود نيم ساعت و براي فرهيختگان وتيزهوشان زماني كمتر از اين لازم است زيرا همه چيز روشن و علمي و قاعده مند است . &lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=justify&gt;|+| نوشته شده توسط ئاسو فه‌يلي در سه شنبه نهم مرداد 1386 و ساعت 22:43  4 نظر  بخش دوم مصاحبه با هفته نامه ی &quot;مهران &quot; در باره ی زبان و ادبیات کردی جنوبی&lt;BR&gt;·        برگرديم به برنامه ي اخبار كردي سيماي ايلام . اين برنامه موافقان ومخالفان زيادي داشته است . آن را چگونه ارزيابي مي كنيد .&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=justify&gt;اگر به آرشيو  همين هفته نامه ي خودتان مراجعه كنيد ، خواهيد ديد كه من پيش از پخش اخبار كردي از سيماي ايلام ، از آن استقبال كردم و يكي از آرزوهايم همين برنامه بود . ظاهراً  اول قرار بود كه اين برنامه زير نظر اهل فن تهيه شود و گروهي از صاحب نظران بر ان نظارت داشته باشند و حتي از من هم جهت اين كار دعوت شد و در جلسه اي با حضور مديريت محترم وقت صدا وسيما آقاي جعفري كه از حاميان و علاقه مندان اين برنامه بود ، تشكيل شد . اما آن چه در عمل ديديم آن بود كه تصميم گرفته شد برنامه را با اتكا به نيروهاي دست رس و موجود صدا وسيما به پيش ببرند كه آن ها هم انصافاً هر چه در توان داشتند به كار گرفتند و توانستند برنامه را با وضع فعلي و ضعف ها و قوت هاي كنوني ادامه دهند و الحمدلله هنوز هم ادامه دارد . علي رغم همه ي اين زحمات نمي توانم نسبت به ضعف هاي آن بي توجه بمانم . يكي از ضعف هاي آن ، استفاده از نيروهاي غير متخصص  در نوشتن اخبار است و اين كه فكر نمي كنم گروه ويراستاري توانمندي بر آن نظارت كند و ضعف هايش را داوري نمايد . مشكل ديگر ، استفاده نكردن از رسم الخط كردي جنوبي است كه گاه با خوانش هاي غلط همراه است . و باز مشكل ديگر آن است كه نيروهايي ويژه براي اين كه تربيت نمي شود و آموزش ها همه تجربي است . سياست گذاري در اين برنامه متمركز نيست و گاه اتفاق مي افتد كه يك مجري به خواست خود كلمه اي را به شكلي كه خودش دوست دارد تلفظ مي كند .  اما علاوه بر مشكلات گفته شده ، اين برنامه دو مشكل عمده ي ديگر دارد كه عبارتند از:&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=justify&gt; 1- مشكل واژه سازي و واژه گزيني در محور جانشيني   . به اين شكل كه يا از كلمه هاي دم دست استفاده مي كنند كه بعضاً سست و دست فرسود و غير معيار و عاميانه است يا خود تلاش مي كنند كه به اتكاي ذوق و سليقه واژه سازي و واژه گزيني كنند كه يا جا نمي افتد يا مورد تمسخر قرار مي گيرد و اين بهانه اي مي شود كه ادعا شود اين زبان شايستگي يك زبان معيار علمي و آموزشي را ندارد . و حاصل اين همه تلاش خالصانه ، بد دفاع كردن از آن شده است . اگر قرار است واژه يا تركيبي جا بيفتد بايد واژه فصيح باشد يعني مخالف اصول صرفي زبان نباشد ، خوش آهنگ و ساده و زيبا باشد ، ظرفيت تبديل شدن به «معيار » را داشته باشد ، خيلي متروك و مهجور نباشد ، زايش داشته باشد يعني اين كه بتوانيم آن را در ساخت ها ي ديگر هم به كار ببريم ،و ... . براي واژه گزيني چند اتفاق ممكن است روي دهد يا خودمان واژه ي مناسب را داريم ، يا با استفاده از ذخيره زباني مي سازيم ، يا واژه ي كهني را تغيير معنا مي دهيم و در معناي جديد به كار مي بريم يا از گويش و لهجه هاي ديگر وام مي گيريم يا در غير همه ي اين موارد همان واژه ي مصطلح را به كار مي بريم . حال كساني لازم است كه بر قواعد صرفي و نحوي زبان مسلط باشند ، از ديگر گويش ها و زبان ها اطلاع داشته باشند و يا اين كه ذوق و ظرافت و توانايي واژه سازي را داشته باشند و همه جوانب را در نظر بگيرند . &lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=justify&gt;2- مشكل نحو و محور هم نشيني :اين مشكل ، مخرب ترين مشكل برنامه ي اخبار كردي سيماي ايلام است . آن ها جمله را دقيقاً از همان كليشه ي فارسي ترجمه مي كنند و حاصل كار خيلي گريه آور است چنان كه من خودم جرأت تماشاي برنامه را ندارم . عزيزان نويسنده و تهيه كننده ي اين برنامه بايد توجه داشته باشند كه نياز نيست خبر يا موضوع را در همان قالب و كليشه ي فارسي بيان كنند ، اول آن عبارت و خبر را خوب بخوانند ، خوب بفهمند و آن چه را كه فهميده اند از نگاه يك كُرد زبان بيان كنند و در ساخت و محور هم نشيني آن تغييرات لازم را اعمال كنند و مي بينيد كه اين ها نكات ظريفي هستند كه انصافاً هر كسي توانايي آن را ندارد . اين مشكل يعني ترجمه ي كليشه و قالب زبان ديگر ، منجر به نابودي و فساد زبان مي شود و از اين منظر مي بينيد كه زبان كردي جنوبي هر روز چه آسيب هاي جان گزايي مي بيند . اگر حوصله اش را داشته باشم شايد زماني نمونه هايي از اين گرته برداري ها و كليشه سازي ها  را ارائه كنم . &lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=justify&gt;·              و اما يك سوال خودماني . چرا علي رغم همه ي دغدغه ها ، بيشتر دغدغه ي زبان كردي جنوبي را داريد .&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=justify&gt;   دليلش ساده است . به خاطر اين كه زبان مادري ام است و كيست  كه زبان مادري اش را دوست نداشته باشد . همه ي زبان ها هديه ي الهي هستند و بايد قدر اين نعمت الهي را بدانيم . اين زبان ، از مجموعه زبان هاي ايراني و آريايي است وبسياري از پيشينه هاي فراموش شده در آن زنده مانده اند . شناخت آن مي تواند پشتوانه اي براي زبان رسمي ما يعني فارسي باشد . من همان اندازه كه به زبان مادري ام علاقه مندم به زبان فارسي به عنوان زبان رسمي و ادبي كشور هم علاقه مندم و از شيفتگان سينه چاك آن هستم و فرهنگ و هويت ايراني برايم بسيار ارجمند است . نگاهم به زبان كردي جنوبي نگاهي صرفاً فرهنگي است و آن را با شائبه اي آميخته نكرده ام . دليل ديگري كه براي پرداختن به اين زبان دارم آن است كه مي بينم وظيفه و رسالتي بر دوشم رها شده است . اكثر كساني كه مي توانستند و مي توانند بخشي از اين رسالت را بر دوش بگيرند به زندگي روزمره مشغول اند و رفاه خود وخانواده را ترجيح داده اند و من و چند آسمان جل مانده ايم كه غيرتمان اجازه نمي دهد اين زبان و اين فرهنگ و اين سرمايه از دست برود و در حد شعر و مقاله و كتاب ونقد و نظري مي كوشيم اين آتش همچنان زبانه بكشد . من از اين كه مي بينم گويشوران كردي جنوبي به آساني از اين نعمت مي گذرند و با بچه هايشان فارسي صحبت مي كنند ، بسيار متأسف مي شوم . من مي گويم همه بايد زبان فارسي و حتي هر زبان ديگري را كاملا ياد بگيريم و بر آن مسلط باشيم سوالم اين است كه چرا بايد اين مسئله به قيمت نابودي زبان مادري مان تمام شود . مگر نمي شود هم زبان مادري را حفظ كنيم و هم فارسي  و انگليسي و عربي و فلان و بهمان زبان را ياد بگيريم . مي گويند هركس به يك زبان مسلط باشد دنيا را از يك منظر نگاه مي كند و آن كه به دو يا چند زبان مسلط باشد دنيا را از زواياي متعددي خواهد مي نگرد . چرا با فراموش كردن زبان مادري زاويه اي به روي جهان ببنديم . گاه سر كلاس هاي دبيرستاني با دانش آموزان برخورد مي كنم كه از درك معني و ظرافت واژگان و و تعابير كردي جنوبي عاجزاند واين گناهي است كه والدين آن ها بر آن ها روا داشته اند و اين معلوليت زباني فرزندان و ناوباوگان معلول خودكم بيني پاره اي از اولياست. از همه ي اين ها گذشته ما نمونه ي عملي و عيني را پيش روي خودمان داريم . كرمانشاهي از ساليان دور به اين بيراهه رفته اند و جز محروم كردن خود و فرزندانشان از يك مولفه ي هويت ساز حاصلي نداشته اند . آيا ما مي خواهيم اين تجربه ي شكست خورده ي را باز تجربه كنيم . اين كه فرزندان ما نتوانند زبان مادري را صحبت كنند و نتوانند با ظرافت هاي فكري و فرهنگي آن ارتباط برقرار كنند چه گلي است كه بايد  برسر خود بزنيم؟! و تازه آن چه به نام فارسي به خورد بچه ها مي دهند ترجمه اي بي در وپيكر و خنده آور است كه گاه دستمايه ي طنز و تمسخر مي شود . مگر ما كه زبان مادري را ياد گرفته ايم بلد نيستيم فارسي حرف بزنيم و به آن بنويسيم . اميد وارم طوفان خودكم بيني آسببي به اساس زبان شيرين مادري مان نزند .&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=justify&gt;·        نام شما تا حدود زيادي با نام غلام رضا خان اركوازي پيوند خورده است . چه جوري شد كه به ايشان علاقه مند شديد ؟&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=justify&gt; غلام رضا خان اركوازي به دلايلي كه در كتاب « شاعر قله هاي مه آلود » نوشته ام شاعر بزرگي است . هم شكل اشعارش عالي است هم محتوايش . علاوه برآن شاعر متعهد و دردمندي است و از جنس شاعران بزرگي چون ناصر خسرو و مسعود سعد سلمان مي باشد . در كتاب مذكور كه شامل شرح و تصحيح ديوان شاعر است ، راز علاقه مندي ام را به او نوشته ام . تقدير چنان بود كه بر اثر اين علاقه مندي هم كنگره ي بزرگ داشت غلام رضا خان اركوازي در ايلام برگزار شود و هم ديوانش را منتشر كنم . ويك خبر فرهنگي اين كه چاپ دوم اين كتاب با نام تازه ي « ديوان غلام رضا خان اركوازي » ان شاءالله تا پايان تابستان اتفاق مي افتد .&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=justify&gt;·        اين كتاب چه فرقي با كتاب قبلي دارد ؟&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=justify&gt; در اين كتاب ، مقدمه ي مفصل تاريخي حذف شده ، چرا كه معتقدم مي تواند در جاي ديگري مستقلاً بيايد . شرح حال ها و تعليقات اندكي تلخيص شده ، حجم اثر تا حد زيادي كاسته شده است اما شعرها با دو رسم الخط قبلي همچنان هستند و اغلاط تايپي رفع شده اند و متن منقح تر و  ويراسته تر شده است با طرح جلدي تازه و نامي تازه يعني « ديوان غلام رضا خان اركوازي » و بعضي تغييرات ديگر .&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=justify&gt;·        متوليان فرهنگي استان براي حفظ و حمايت زبان مادري مان چه كرده اند و چه مي توانند بكنند ؟&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=justify&gt;خيلي كارها مي توانند بكنند ؛ اين كه حمايت مالي كنند ، از كتاب هاي منتشر شده بخرند ، از طرح هاي پژوهشي و پايان نامه هاي مرتبط حمايت كنندو... . مي بينم تا به حال چنين اتفاقي نيفتاده و خيلي از شاعران و محققان ما با پول خودشان كتاب هايشان را چاپ مي كنند .  يعني توي شاعر و محقق هم بايد شعربگويي و پژوهش كني ، هم پول چاپش را بدهي و هم بار توزيعش را به دوش بكشي . زيرا مي دانيم كه در استان ايلام ناشر يعني كسي كه پول چاپ كتاب را پر وپيمان از تو مي گيرد و در قبال توزيع آن هيچ مسئوليت ندارد . يك بار با دوستي از روز طنز وطيبت و اندكي شيطنت مي گفتم بهتر است از اين به بعد به جاي واژه ي نامفهوم و نآشناي « ناشر» بگوييم: « چاپِن» زيرا هم كردي است و هم ايهام لطيفي دارد؛ يك معنايش« چاپ كننده » ويك معنايش، آن كه كارش « چاپيدن» است . اميدوارم ناشران عزيز از اين شوخي من نرنجند . تازه شوخي هايي هم با كتاب فروش هاي همشهري دارم كه به علت پرهيز از دشمن تراشي از آن ها  مي گذرم . و اما بعد، عيب مي جمله بگفتي هنرش نيز بگو. هنوز خاطره خوب كنگره ي بزرگ داشت غلام رضا خان اركوازي كه به همت اداره ي كل فرهنگ ارشاد اسلامي ايلام در زمان رياست آقاي نعمتي برگزار شد از خاطرمان محو نشده است . صدا وسيما - هرچند به سائقه ي وظايف تعريف شده خويش-  نقش مهمي درترويج و حفظ زبان بومي دارد و لازم است از كاركنان خدومش تشكر شود . و شاهد بوده ايم كه حوزه ي هنري سازمان تبليغات اسلامي ايلام در زمان رياست آقاي فرخنده نيز منشا خدمات ارزشمندي بوده است .  كانون پرورش فكري كودكان و نوجوانان به خاطر علاقه مندي به بعضي آداب و رسوم محلي در زمان مسئوليت آقاي پاك سرشت در خور تقدير است و البته نقش مطبوعات استان نيز غيرقابل انكار است  . &lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=justify&gt;·        در اين سياهه اي كه ذكر كرديد نامي از دانشگاه هاي استان نبود  ، چرا ؟&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=justify&gt;  به خاطر اين كه واقعاً كاري نكرده اند . ممكن است استادي به خاطر علاقه مندي شخصي كاري كرده باشد و كتاب و مقاله اي نوشته باشد يا دانشجوياني با تحمل دردسرهايي انجمن ادبي اي داير كرده باشند  اما به طور كلي سياست دانشگاه هاي استان در اين زمينه حمايت از زبان وادبيات كردي استان نبوده است و اصولاً‌ ايلام شناسي جايگاه در خوري در نزدشان نداشته است . با اين وصف دانشگاه آزاد ، اندكي بومي تر به نظر مي رسد به خاطر پاره اي از كارهايش . متاسفانه بايد گفت كه نقش دانشگاهيان در توليد علم و تحقيق و پژوهش در حوزه ي مورد بحث ناچيز است . &lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=justify&gt;·              چه كنيم اين زبان و ادبيات بالنده بماند ؟&lt;/P&gt;
&lt;P dir=rtl align=justify&gt;به دور از هرگونه تعصب و حاشيه اي ، به آن علاقه مند باشيم . هر كس در هر جايگاهي كه هست به آن خدمت كند . بكوشيم با فرزندانمان به زبان مادري سخن بگوييم . آداب و رسوم و باورهاي مثبتش را حفظ كنيم . براي حفظ زبان بومي بايد جغرافيا و فرهنگ بومي را نيز پاس داشت . اين كه با تفرعني بورژوايانه همه اش به فكر سود باشيم و براي رسيدن به قله هاي جاه طلبي از مادر خود – منظورم همان زبان ، ادبيات و فرهنگ محلي و كردي است – بگذريم كاري اخلاقي نيست . ما بدون اين زبان به جاي اين كه صاحب خانه باشيم مهمان خواهيم بود و به راستي مگر يك مهمان چقدر مي تواند طفيل ديگران باشد . اين كوه ها و جنگل ها و رودخانه ها دربستر زبان معنا مي يابند . &lt;BR&gt;منبع : &lt;A href=&quot;http://www.ilamtoday.com/article/printable.asp?num=168&quot;&gt;http://www.ilamtoday.com/article/printable.asp?num=168&lt;/A&gt;&lt;BR&gt;&lt;SPAN lang=fa style=&quot;FONT-SIZE: 10pt&quot;&gt;نگارنده:&lt;/SPAN&gt;&lt;FONT color=#3e8bc0&gt;&lt;FONT size=2&gt;&lt;SPAN lang=fa&gt; &lt;/SPAN&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;SPAN lang=fa style=&quot;FONT-SIZE: 10pt&quot;&gt;موسي اميدي mosaomidi_kord@yahoo.com &lt;/SPAN&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;SPAN style=&quot;FONT-SIZE: 10pt&quot;&gt;   تاريخ انتشار:&lt;FONT color=#3e8bc0&gt;  15/5/1386&lt;/FONT&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/P&gt;</description>
<pubDate>Tue, 04 Aug 2009 09:47:17 GMT</pubDate>
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<title>زبان کردی خانواده </title>
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<description>خانواده کردی هووز کوردی&lt;BR&gt;ژن(ئافره ت): زن&lt;BR&gt;پیا : مرد &lt;BR&gt;کور : پسر&lt;BR&gt;دوه ت(کیچ) : دختر &lt;BR&gt;باوک : پدر&lt;BR&gt;دالک(دایک) :مادر&lt;BR&gt;برا : برادر&lt;BR&gt;خوه یشک : خواهر&lt;BR&gt;باپیر : پدر بزرگ&lt;BR&gt;داپیر(نه نگ) : مادربزرگ&lt;BR&gt;مام(تاتگ) : عمو&lt;BR&gt;خالوو :دایی&lt;BR&gt;میمگ : خاله و عمه&lt;BR&gt;زاوا : داماد&lt;BR&gt;وه یو : عروس&lt;BR&gt;خه سوره : مادرزن و پدر زن و پدر شوهر و مادر شوهر و برادر زن &lt;BR&gt;شو : شوهر&lt;BR&gt;ژن : زن و عیال&lt;BR&gt;هاو زاوا : باجناق&lt;BR&gt;ئامووزا : پسر عمو و دختر عمو&lt;BR&gt;خالووزا : پسر دایی و دختر دایی&lt;BR&gt;میمزا : پسر عمه و پسر خاله و دختر عمه و دختر خاله&lt;BR&gt;ژن خالوو : زن دایی&lt;BR&gt;ژن تاتگ : زن عمو&lt;BR&gt;شو میمگ : شوهر خاله و شوهر عمه&lt;BR&gt;دوه ته ر زا : نوه دختری&lt;BR&gt;کررزا : نوه پسری&lt;BR&gt;دش : خواهر شوهر</description>
<pubDate>Tue, 04 Aug 2009 09:44:37 GMT</pubDate>
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<title>  تاريخچه زبان کردي </title>
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<description>&lt;TABLE class=tblBorder cellSpacing=0 cellPadding=0 align=right border=0&gt;
&lt;TBODY&gt;
&lt;TR&gt;
&lt;TD&gt;&lt;IMG style=&quot;WIDTH: 222px; HEIGHT: 167px&quot; src=&quot;http://www.afarineshdaily.ir/CrThumb.aspx?Pic=afarinesh\Images\422\432791526217296.jpg&amp;X=222&amp;Y=167&quot; align=right border=0&gt;&lt;/TD&gt;&lt;/TR&gt;&lt;/TBODY&gt;&lt;/TABLE&gt; کردستان - خبرنگار آفرينش&lt;BR align=&quot;justify&quot;&gt;هنگامي که از زبان کردي سخن به ميان ميآيد، مقصود زباني است که کردها هم اينک با آن سخن ميگويند. برخي از زبان شناسان و شرق شناسان فرنگي که با زبان کردي مانوس بوده اند، بيشتر اين اطلاعات را به شکلي کلي يا ويژه ارائه داده وگفته اند که: اين زبان در عداد زبانهاي هند و اروپايي و خانواده هاي هند و ايراني و در زمره ي زبانهاي ايراني است وبا زبان فارسي قرابت نزديکي دارد.اينک اين سوال پيش ميآيد که پيدايش زبان کردي چگونه بوده است؟ اشکار است که زبان هر زاد و بومي زبان ساکنان آن است; اگر رويدادهاي تاريخي باعث ايجاد تغييرات نژادي  نشده باشد آن زبان همان زبان ساکنان ديرين آن سرزمين است. عکس اين موضوع نيز صادق است. اينک ببينيم اين موضوع در مورد زبان کردي چگونه صدق مي کند؟.سرزميني که آن را کردستان مينامند و کردها در آن ساکنند، محل کشف باقيماندهي اجساد فسيل شدهي انسانهاي باستاني است. اين استخوانها که در &quot;شانه دري&quot; يافت شده است، داراي اهميت بسياري است; چرا که، اولين بار است بقاياي انسان عصر سنگي - که &lt;FONT dir=ltr align=&quot;justify&quot;&gt;60&lt;/FONT&gt; هزار سال پيش از اين عراق را مسکن خويش ساخته است، يافت ميشود .شصت هزار سال پيش از اين محدوده اي که اينک کردستان ناميده ميشود،آباد و ماوا و پناهگاه مردماني بوده که زباني هم براي سخن گفتن داشته اند; اما از آن جا که سخن گفتن درباره اين زبان کار دانشمندان  باستان شناس است; به همين جهت  همراه با تابش انوار آفتاب &lt;FONT dir=ltr align=&quot;justify&quot;&gt;57200&lt;/FONT&gt; ساله  بربالهاي زمان و گذر ايام خود را به پيش ميکشيم و به دوراني ميرسانيم که، اقوام ماد خود را به ايران کنوني و غرب آسيا رساندند و با نژادهاي خوژيايي، لولو، گوتي، کاسي، (خوري  يا هوري ) - که در دامنه هاي آن سوي کوههاي زاگرس ميزيستند و تا حد مناسبي زندگي خود را سامان داده بودند و جمهوري و تمدني نسبتا پيشرفته تاسيس کرده بودند - مواجه شدند.مادها ظرف &lt;FONT dir=ltr align=&quot;justify&quot;&gt;200&lt;/FONT&gt; سال طومار اين حکومتها را در هم پيچيدند و در سال &lt;FONT dir=ltr align=&quot;justify&quot;&gt;612&lt;/FONT&gt; پيش از ميلاد مسيح امپراتوري بزرگ مادي را بنيان نهادند و بدين ترتيب زبان مادي به زبان رسمي بدل شد. از آن زمان تا هنگام انتشار اسلام در کردستان، سيزده قرن سپري شده است. در اين مدت طولاني سرزمين ماد بزرگ و کوچک و سرزمينهاي ديگري که به سرزمين ماد ملحق شده اند; از حيث نظامي وسياسي بسيار دست به دست شده اند.  و قدرت سياسي به دست افراد مختلفي - که زبان آنها با زبان مادها متفاوت بوده است - افتاده است. هر حکومتي هم که برسر کار آمده زبان خود را به عنوان زبان رسمي بر اين سرزمين تحميل کرده است. در اوضاع واحوال آن روزگاران، که تمامي بنيادهاي اجتماعي کم رنگ شده و رو به افول نهاده  بوده است، اين جابه جايي درقدرت نمي تواند از تاثير نهادن بر اين بنيادها برکنار بوده باشد. تاريخ، برخي رويدادها را ثبت کرده و است که طي آن، سلطه اي  سياسي بريک سرزمين، تغييرات نژادي بنيادي ايستايي زبان را در آن سرزمين باعث شده است.  امروز ردپاي تاثير جابه جايي در قدرت را در شرق قلمرو امپراتوري ماد  به وضوح مي توآن ديد. به عکس در بخشي از غرب سرزمين ماد، بنيادها همچنان دست نخورده مانده است.  بلکه تسلط مادها وضعيت نژادي وزباني برخي از سرزمين هايي را که بعدا به قلمرو مادها ملحق شد، تغيير داده و به مسير توسعه  مادي کشانده است و به موازات بخش غربي قلمرو خود، آنها را توسعه داده است.بيشتر تاريخ شناسان پر آوازه براين باورند که، کردهاي امروز نوادگان مادهاي ديروزند.&quot;اگر کردها نوادگان مادها نباشند، پس برسر ملتي چنين کهن و مقتدر چه آمده است و اين همه قبيله و  تيرهي مختلف کرد که به يک زبان ايراني و جداي از زبان ديگر ايرانيان تکلم مي کنند; از کجا آمده اند؟&quot; ( مينورسکي يش از اين گفتيم: زبان هر سرزميني - اگر رويدادهاي تاريخي آن راتغيير نداده باشند -  زبان ساکنان کهن همان سرزمين است.  چنان که گفته شد رويدادهاي تاريخي وجابه جايي حکومتها طي سيزده قرن، نتوانسته است چيزي رادر بخش غربي قلمرو ماد، تغيير دهد. و امروز  ساکنان اين بخش از مادستان کهن، کردها هستند که نوادگان ميدي ها به شمار ميروند. به راستي بيش از اين که بگوييم زبان کردي از اساس پايان نشو و نما و تکامل زبان مادي است; ميتوان به گونه  ديگري اظهار نظر کرد; اسناد تاريخي که دانشمندان - تنها به منظور خدمات علمي - بررسي و تجزيه و تحليل کرده اند; تاکنون همين حقيقت را آشکار کرده اند که; زبان کردي امروز آثار و نشانه هاي کمال يافتگي زبان مادي ديروز را در خود دارد.همچنان که آگاهيم، زبان يک پديده اجتماعي است که براساس قواعد مشخص خود تغيير ميکند; تکامل و توسعه مييابد و در سير تکاملي خود از ديگر زبانها تاثير ميپذيرد; و او هم بر آنها اثر ميگذارد و گاهي در اين گير و دار ميميرد.  زبان مادي نيز از اين قاعده مستثني نيست و از همه  زبانهايي که به پشتوانه  قدرت سياسي در قلمرو ماد زبان رسمي بوده اند، تاثير پذيرفته و برآنها تاثير گذاشته است و تا امروز زنده مانده است.بويژه زبان پارتي (فارسي =  پهلوي اشکاني) ، که به نظر زبان شناسان همراه با زبان مادي در زمره زبانهاي شمال  شرقي، خانواده زبان ايراني جاي ميگيرند. ;بيش از ديگر زبانها بر زبان مادي تاثير نهاده است و امروزه رد پاي اين تاثيرات در گويش آييني زبان کردي، ديده مي شود.همزمان با سقوط و فروپاشي امپراتوري ساساني و ترويج اسلام در کردستان، وقفه تازهاي براي زبان کردي آغاز شد - که جداگانه در مورد آن بحث خواهد شد - تنها مشکل اين است که ما از زبان مادي اواخر دورهي ساساني سند مکتوبي در دست نداريم تا موشکافانه در باره  آن اظهار نظر کنيم. اما اين موضوع سبب نخواهد شد که نتوانيم  بگوييم: اين زبان در آن زمان زبان مادي بوده است.  که به نسبت زبان رايج دوران اقتدار امپراتوري، دستخوش تغييرات &lt;FONT dir=ltr align=&quot;justify&quot;&gt;1300&lt;/FONT&gt; ساله شده است.  به همان نسبت که زبان پارسي باستان پيشرفت کرده و به زبان دري / پارسيک تبديل شده و آمادگي و ظرفيت آنرا يافته است که زبان پارسي کنوني از آن جدا شود; يک نتيجه گيري آني اقتضا ميکند که، زبان مادي هم پيشرفت کرده و دستخوش چنان تحولات و دگرگوني هايي شده باشد. که استخراج زبان کردي از آن ممکن شده باشد&lt;BR align=&quot;justify&quot;&gt;استان کردستان يکي از استان هاي کردنشين در غرب ايران است ، اکثريت ساکنان اين استان ، کرد زبان هستند که به لهجه هاي مختلف تکلم مي کنند . درباره زبان کردي&lt;BR align=&quot;justify&quot;&gt; مردم شناسان بر اين راي هستند که زبان کردي يکي از زبان هاي گروه هند و اروپايي و ايراني است.&lt;BR align=&quot;justify&quot;&gt;زبان کردي در استان کردستان و همچنين در استان هاي الام ، کرمانشاه ، همدان ، آذربايجان غربي و شمال خراسان و ديگر کشورها لهجه هاي گوناگوني دارد اما مهمترين ، پر تکلم ترين و يا به عبارتي لهجه رسمي و ادبي دو شاخه کرمانجي و سوراني است ، شاخه سوراني در استان کردستان لهجه رايج در ادبيات مکتوب است . شيوه غالب زندگي مردم در اين استان سنتي و با هويتي قومي است . وجود حدود &lt;FONT dir=ltr align=&quot;justify&quot;&gt;1900&lt;/FONT&gt; روستا در استان نمايانگر انس مردم به طبيعت و کشاورزي است.&lt;BR align=&quot;justify&quot;&gt;به استناد شواهد و مدارک مستند تاريخي ، قوم کرد از نژاد آريايي هستند که در هزاره اول قبل از ميلاد مسيح از کناره هاي درياي خزر به سلسله کوه هاي زاگرس آمده و با غلبه بر قدرت آشوريان در نينوا امپراطوري مادها را در قرن هفتم قبل از ميلاد در ايران پايه گذاري کردند.</description>
<pubDate>Tue, 04 Aug 2009 09:42:43 GMT</pubDate>
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